रीवा संभाग की शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल: निजी स्कूलों की जांच और सरकारी शिक्षा में सुधार की मांग तेज

रीवा संभाग की शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल: निजी स्कूलों की जांच और सरकारी शिक्षा में सुधार की मांग तेज

रीवा - रीवा संभाग में शिक्षा व्यवस्था को लेकर आमजन के बीच लगातार चर्चा तेज होती जा रही है। अभिभावकों, सामाजिक संगठनों और शिक्षा से जुड़े लोगों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में निजी विद्यालयों की नियमित जांच और शासन द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुपालन को लेकर अपेक्षित स्तर पर निगरानी दिखाई नहीं दे रही है। यह भी मांग उठ रही है कि संभागीय स्तर से लेकर जिला प्रशासन तक निजी विद्यालयों का व्यापक निरीक्षण अभियान चलाया जाए, ताकि बच्चों को सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और नियमों के अनुरूप शिक्षा उपलब्ध हो सके।

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का दावा है कि जहां कुछ निजी विद्यालय शासन के नियमों का पालन कर रहे हैं, वहीं बड़ी संख्या में ऐसे विद्यालय भी हैं जिन पर विभिन्न मानकों के पालन को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं। इनमें शिक्षकों को निर्धारित वेतनमान या श्रम संबंधी नियमों के अनुरूप पारिश्रमिक न मिलना, पर्याप्त प्रयोगशालाओं का अभाव, पुस्तकालयों की कमी, खेल मैदान न होना तथा विषय विशेषज्ञ प्रशिक्षित शिक्षकों की अनुपलब्धता जैसी शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। इन दावों का प्रशासनिक स्तर पर सत्यापन आवश्यक माना जा रहा है।

दूसरी ओर, सरकारी विद्यालयों की स्थिति भी चिंता का विषय बताई जा रही है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में छात्र संख्या लगातार घटने की बात कही जा रही है। कुछ विद्यालयों के बंद होने या एकीकरण के बाद अनेक भवन आज भी उपयोग के अभाव में जर्जर अवस्था में दिखाई देते हैं। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी विद्यालयों को आधुनिक सुविधाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों और बेहतर संसाधनों से सशक्त किया जाए तो अभिभावकों का विश्वास दोबारा मजबूत हो सकता है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह भी कहना है कि वर्तमान समय में निजी शिक्षा का दायरा तेजी से बढ़ा है और शिक्षा का खर्च लगातार महंगा होता जा रहा है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। साथ ही यह चिंता भी व्यक्त की जा रही है कि यदि शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी तो समाज में बढ़ती सामाजिक चुनौतियों, विशेषकर युवाओं में नशे जैसी समस्याओं से प्रभावी ढंग से मुकाबला करना कठिन होगा।

विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। पूर्व वर्षों में विद्यालय भवनों की दीवार गिरने तथा क्षमता से अधिक बच्चों को निजी वाहनों में ले जाने जैसी घटनाओं ने कई मासूमों की जान जोखिम में डाली है। इसके बावजूद समय-समय पर ओवरलोड स्कूली वाहनों और सुरक्षा मानकों की अनदेखी की शिकायतें सामने आती रहती हैं। अभिभावकों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्येक निजी और शासकीय विद्यालय का नियमित सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट), आधारभूत सुविधाओं का भौतिक सत्यापन, शिक्षकों के वेतन एवं सेवा शर्तों की जांच तथा स्कूल वाहनों की सघन जांच अभियान चलाया जाना चाहिए। साथ ही जिन विद्यालयों में शासन के नियमों का उल्लंघन पाया जाए, उनके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

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