पत्रकारिता का बाजार गर्म… कलम ठंडी क्यों?

सवाल खबर का नहीं, अब संपर्क का है; सत्ता की नजदीकी बन रही पत्रकारिता की नई कसौटी?

कभी पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत उसकी कलम और सवाल हुआ करते थे। सत्ता के गलियारों में यह चिंता रहती थी कि आज पत्रकार ने क्या देखा और कल अखबार में कौन-सा सवाल उठने वाला है। लेकिन बदलते दौर में पत्रकारिता के सामने एक नया सवाल खड़ा हो रहा है—क्या पत्रकार की पहचान उसकी खबर से होगी या उसके संपर्कों से? जमीन पर उतरकर खबर जुटाने वाला पत्रकार घटनास्थल तक पहुंचता है, लोगों की समस्याएं सुनता है, दस्तावेज खंगालता है और तथ्यों की पुष्टि करता है। इसके विपरीत कहीं-कहीं ऐसे चेहरे भी दिखाई देते हैं जिनकी पहचान उनकी खबरों से कम और राजनीतिक या प्रशासनिक संपर्कों से ज्यादा होती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि पत्रकारिता की असली कसौटी आखिर क्या होनी चाहिए?

खबर पीछे, संपर्क आगे?

सोशल मीडिया ने पत्रकारिता को नई गति दी है। अब खबर कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है। लेकिन इसी तेजी ने एक खतरा भी पैदा किया है—बिना पर्याप्त तथ्य-जांच के खबरों को प्रस्तुत करने का। पत्रकारिता में तेजी जरूरी है, लेकिन विश्वसनीयता उससे भी ज्यादा जरूरी है। खबर सबसे पहले देने की होड़ में यदि तथ्य पीछे छूट जाएं तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता कमजोर होती है। सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब पत्रकार सवाल पूछने से पहले यह सोचने लगे कि उसकी खबर से किसी प्रभावशाली व्यक्ति की नाराजगी तो नहीं होगी। यदि सत्ता से नजदीकी खबर की दिशा तय करने लगे तो पत्रकार और जनसंपर्क के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

पत्रकार किसके लिए लिखता है?

पत्रकार का पहला दायित्व जनता के प्रति है। सड़क खराब है तो सवाल सड़क पर होना चाहिए। अस्पताल में अव्यवस्था है तो सवाल स्वास्थ्य व्यवस्था से होना चाहिए। सरकारी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंच रहा है तो सवाल संबंधित विभाग से होना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि हर खबर सरकार या प्रशासन के खिलाफ हो। अच्छी पत्रकारिता का मतलब विरोध करना नहीं, सच को सामने रखना है। सरकार का अच्छा काम हुआ है तो उसकी सराहना भी होनी चाहिए और कमी है तो सवाल भी पूछा जाना चाहिए।

अधिमान्यता पहचान हो सकती है, पत्रकारिता नहीं

किसी पत्रकार को मिली अधिमान्यता या किसी संस्था से जुड़ी पहचान महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन वह पत्रकारिता की गुणवत्ता का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकती। असली पहचान उसकी खबरों की विश्वसनीयता, निष्पक्षता, तथ्य और जनसरोकार से बनती है।

जिसके पास कलम है, उसे तथ्य चाहिए।
जिसके पास तथ्य हैं, उसे साहस चाहिए।
और जिसके पास साहस है, वही सत्ता से सवाल कर सकता है।

आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह संपर्कों के प्रभाव से ऊपर उठकर जनता के भरोसे को प्राथमिकता दे।

सत्ता बदलेगी, भरोसा रहना चाहिए

नेता बदलेंगे, सरकारें बदलेंगी, अधिकारी बदलेंगे और राजनीतिक समीकरण भी बदलते रहेंगे। लेकिन पत्रकार की विश्वसनीयता एक दिन में नहीं बनती। उसे वर्षों की मेहनत, निष्पक्षता और साहस से अर्जित करना पड़ता है। पत्रकार को यह तय करना होगा कि उसे सत्ता की नजदीकी चाहिए या जनता का भरोसा। क्योंकि सत्ता से मिला लाभ समय के साथ बदल सकता है, लेकिन जनता का विश्वास पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी है।

पत्रकारिता नौकरी भर नहीं, जनता के प्रति जिम्मेदारी है। इसलिए कलम को संपर्कों की गर्मी में ठंडा नहीं पड़ने देना चाहिए। आखिर सवाल यही है—पहचान चाहिए या सम्मान? अधिमान्यता चाहिए या विश्वसनीयता? सत्ता की नजदीकी चाहिए या जनता का भरोसा? क्योंकि जो कलम सत्ता के दरबार में झुक जाती है, वह जनता के सामने सच लिखने का साहस खो देती है।



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