रामलीला मंच पर बेसहारा मिला दिव्यांग बुजुर्ग, पुलिस की मदद से पहुंचाया वृद्धाश्रम

रामलीला मंच पर बेसहारा मिला दिव्यांग बुजुर्ग, पुलिस की मदद से पहुंचाया वृद्धाश्रम

सोहागपुर - नगर के गढ़ी रामलीला मंच, वार्ड क्रमांक-4 में मानवता को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई, जहां एक दिव्यांग बुजुर्ग कई दिनों से खुले मंच पर असहाय अवस्था में पड़े मिले। जीवन के उस पड़ाव पर, जब बुजुर्गों को परिवार के स्नेह, सुरक्षा और सहारे की सबसे अधिक जरूरत होती है, उस समय उनका इस तरह बेसहारा अवस्था में मिलना समाज के सामने कई सवाल खड़े करता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार बुजुर्ग कई दिनों से रामलीला मंच परिसर में ही पड़े हुए थे। आसपास से गुजरने वाले लोग अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें भोजन और पानी उपलब्ध करा रहे थे, लेकिन उनके रहने और स्वास्थ्य की उचित व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। खुले आसमान के नीचे बिना बिस्तर और आवश्यक देखभाल के जीवन गुजार रहे बुजुर्ग की स्थिति देखकर लोगों का मन भी व्यथित था।

मामले की जानकारी मिलने के बाद देर रात करीब 11 बजे समाजसेवी और स्थानीय लोग मौके पर पहुंचे। वहां बुजुर्ग की स्थिति देखकर तत्काल उनकी सहायता करने का निर्णय लिया गया। अगले दिन सबसे पहले बुजुर्ग को सम्मानपूर्वक स्नान कराया गया। इसके बाद उन्हें स्वच्छ कपड़े पहनाए गए और उनकी आवश्यक देखभाल की गई।

बुजुर्ग को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए पुलिस वाहन 112 की सहायता ली गई। पुलिस की मदद से उन्हें वृद्धाश्रम पहुंचाया गया, जहां अब उनके रहने, भोजन और देखभाल की व्यवस्था हो सकेगी। इस पहल से बुजुर्ग को कम से कम जीवन के इस कठिन दौर में सुरक्षा और सम्मान मिलने की उम्मीद जगी है।

इस मानवीय कार्य में समाजसेवी एवं पार्षद सिल्लू रजक, विकास जोतवानी, शोभित वर्मा सहित अन्य स्थानीय लोगों ने सहयोग किया। स्थानीय लोगों की इस पहल की सराहना की जा रही है।

परिवार और समाज दोनों के लिए सवाल

यह घटना केवल एक बुजुर्ग की स्थिति नहीं, बल्कि समाज और परिवार की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़ा करती है। आखिर ऐसी क्या परिस्थितियां रहीं कि एक दिव्यांग बुजुर्ग को खुले मंच पर कई दिनों तक बेसहारा जीवन बिताना पड़ा? क्या उनके परिवार का कोई सदस्य नहीं था, या परिस्थितियों ने उन्हें इस हालत तक पहुंचा दिया? इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है।

बुजुर्ग किसी भी समाज की अनुभव और संस्कार की धरोहर होते हैं। यदि हमारे आसपास कोई वृद्ध, दिव्यांग या बेसहारा व्यक्ति दिखाई दे तो उसकी मदद के लिए आगे आना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है।

मानवता की असली पहचान यही है कि जो व्यक्ति खुद अपनी मदद करने में सक्षम नहीं है, उसके लिए समाज सहारा बने। सोहागपुर की इस पहल ने कम से कम यह संदेश जरूर दिया है कि संवेदनशीलता और इंसानियत आज भी जिंदा है।

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