| विकास बनाम विरासत: जब जनप्रतिनिधि का एजेंडा विकास से हटकर धार्मिक संरचनाओं पर केंद्रित हो जाए |
रीवा - लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का पहला धर्म जनता के जीवन को बेहतर बनाना होता है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, रोजगार और आधारभूत सुविधाएँ ही उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता की वास्तविक कसौटी होती हैं। किंतु जब विकास के प्रश्न पीछे छूट जाएँ और सार्वजनिक विमर्श का केंद्र धार्मिक स्थलों, अतिक्रमण और आस्था की राजनीति बन जाए, तब यह केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। मनगवा विधानसभा के विधायक नरेंद्र प्रजापति द्वारा कलेक्टर रीवा को लिखे गए पत्र, जिसमें नगर परिषद मनगवा के वार्ड क्रमांक-9 स्थित ऐतिहासिक मलकपुर तालाब परिसर में निर्मित ईदगाह एवं मीनार के संबंध में कार्रवाई की मांग की गई है, ने क्षेत्र की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। पत्र के सोशल मीडिया पर सार्वजनिक होने के बाद यह मुद्दा केवल प्रशासनिक पत्राचार नहीं रहा, बल्कि जनचर्चा और राजनीतिक विमर्श का विषय बन गया है। प्रश्न केवल अतिक्रमण का नहीं, समानता के सिद्धांत का भी है
यदि किसी भी शासकीय भूमि पर बिना वैधानिक अनुमति निर्माण हुआ है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई विधि के अनुसार होना स्वाभाविक है। किंतु विधि का सबसे मूलभूत सिद्धांत यह है कि कार्रवाई चयनात्मक नहीं, समान रूप से हो। यदि तालाब परिसर में मंदिर, चबूतरे, दरगाह, ईदगाह अथवा अन्य धार्मिक संरचनाएँ वर्षों से विद्यमान हैं, तो प्रशासन को किसी एक समुदाय विशेष की संरचना तक सीमित न रहकर संपूर्ण राजस्व अभिलेख, निर्माण की तिथि, स्वामित्व, वैधानिक अनुमति एवं अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष परीक्षण करना चाहिए। कानून की दृष्टि में सभी समान हैं, इसलिए कानून का प्रयोग भी समान होना चाहिए।
नगर परिषद द्वारा सूचना के अधिकार के अंतर्गत उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार ईदगाह एवं मीनार के निर्माण की अनुमति संबंधी कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है तथा निकाय द्वारा ऐसा कोई निर्माण नहीं कराया गया। यह तथ्य अपने आप में जांच का विषय अवश्य है। परंतु उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि मंदिरों की स्थापना कब हुई? दरगाह एवं ईदगाह का ऐतिहासिक अस्तित्व कितना पुराना है? क्या ये संरचनाएँ वर्तमान निकाय गठन से पूर्व की हैं? क्या पुराने राजस्व अभिलेख, ग्राम पंचायत अथवा अन्य शासकीय रिकॉर्ड इनका उल्लेख करते हैं? जब तक इन प्रश्नों के उत्तर अभिलेखीय रूप से स्थापित नहीं होते, तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुँचना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
लोकतांत्रिक समाज में जनता अपने प्रतिनिधियों से अपेक्षा करती है कि वे अस्पतालों की व्यवस्था सुधारें, विद्यालयों की गुणवत्ता बढ़ाएँ, युवाओं के लिए रोजगार सुनिश्चित करें, किसानों की समस्याएँ हल करें और शहरों की मूलभूत सुविधाओं का विस्तार करें। यदि सार्वजनिक विमर्श बार-बार धार्मिक प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमने लगे, तो यह स्वाभाविक है कि नागरिक पूछें- क्या विकास के सभी प्रश्न हल हो चुके हैं, या राजनीतिक ऊर्जा अब सांकेतिक मुद्दों पर केंद्रित हो गई है? कलेक्टर और जिला प्रशासन के समक्ष यह प्रकरण केवल अतिक्रमण हटाने का नहीं, बल्कि कानून के निष्पक्ष अनुपालन की परीक्षा है। यदि कार्रवाई हो तो वह संपूर्ण तथ्यों, राजस्व अभिलेखों, न्यायालयीन निर्णयों, धार्मिक स्थलों की ऐतिहासिक स्थिति तथा सभी पक्षों को सुनने के बाद ही हो। अन्यथा किसी भी एकपक्षीय कार्रवाई से सामाजिक सौहार्द प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी निष्पक्षता है, न कि उसकी चयनात्मकता। जनप्रतिनिधि को जनभावनाओं का सम्मान करने के साथ-साथ विकास, सुशासन और सामाजिक समरसता के बीच संतुलन स्थापित करना होता है। वहीं प्रशासन का दायित्व है कि वह कानून को किसी धर्म, दल या व्यक्ति के चश्मे से नहीं, बल्कि संविधान के सिद्धांतों के आधार पर लागू करे। मलकपुर तालाब का यह विवाद अंततः केवल एक भूमि विवाद नहीं, बल्कि यह उस प्रश्न का उत्तर भी खोजेगा कि लोकतंत्र में प्राथमिकता विकास को मिलेगी या विवादों को, संविधान को मिलेगी या भावनात्मक ध्रुवीकरण को।