| "पर्यावरण का बिगड़ता संतुलन और कागजी वृक्षारोपण का खेल : आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद वृक्ष कहां गए?" |
रीवा - पर्यावरण संरक्षण और जलवायु संतुलन को लेकर शासन-प्रशासन हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर बड़े-बड़े वृक्षारोपण अभियान चलाने के दावे करता है, लेकिन धरातल की वास्तविकता इन दावों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। रीवा जिले सहित पूरे विंध्य क्षेत्र में पुराने विशाल वृक्षों के सूखने की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि उनके स्थान पर लगाए गए नए पौधों के जीवित रहने का कोई वास्तविक और पारदर्शी आंकड़ा आज तक सामने नहीं आ सका है। ग्रामीण अंचलों के अनुभवी किसानों का कहना है कि पिछले एक दशक में पुराने वृक्षों के सूखने की रफ्तार चिंताजनक रूप से बढ़ी है। विशेष रूप से पीपल, बरगद, नीम, आम और जामुन जैसे दीर्घकालिक एवं पर्यावरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष तेजी से समाप्त हो रहे हैं। किसानों का मानना है कि धान और गेहूं जैसी फसलों में अंधाधुंध कीटनाशक एवं रासायनिक दवाओं का उपयोग भू-जल और बोरवेल के पानी को प्रदूषित कर रहा है, जिसका सीधा प्रभाव वृक्षों की जड़ों और उनकी प्राकृतिक वृद्धि पर पड़ रहा है।
पुराने वृक्षों का कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं
सबसे गंभीर बात यह है कि शासन के किसी भी अभिलेख में यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि किसी जिले या ग्राम पंचायत में प्रतिवर्ष कितने पुराने वृक्ष सूखे, कितने काटे गए और उनकी भरपाई के लिए कितने पौधे लगाए गए। राजस्व विभाग के खसरा अभिलेखों में भी वृक्षों की वास्तविक संख्या और उनकी स्थिति का विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है। ऐसे में यह जान पाना लगभग असंभव हो जाता है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर किए जा रहे कार्यों का वास्तविक लाभ कितना मिल रहा है।
वृक्षारोपण के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च
प्रत्येक वर्ष जुलाई और अगस्त माह में विभिन्न विभागों द्वारा बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाए जाते हैं। पूर्ववर्ती सरकारों से लेकर वर्तमान सरकार तक इन अभियानों को अलग-अलग नामों से संचालित किया जाता रहा है। वर्तमान में "मां के नाम एक वृक्ष" जैसे अभियान को व्यापक प्रचार-प्रसार के साथ संचालित किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर अधिकारियों, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों के पौधे लगाते हुए हजारों फोटो और वीडियो साझा किए जाते हैं। लेकिन यदि दो से तीन वर्ष पूर्व लगाए गए पौधों का भौतिक सत्यापन किया जाए, तो अधिकांश स्थानों पर वे पौधे दिखाई नहीं देते। कई सरकारी कार्यालयों, विद्यालय परिसरों और पंचायत क्षेत्रों में जहां कभी वृक्षारोपण के बोर्ड लगाए गए थे, आज वहां बंजर भूमि नजर आती है। प्रश्न यह है कि जिन पौधों के लिए गड्ढे खोदे गए, श्रमिकों को भुगतान हुआ और रखरखाव की राशि स्वीकृत हुई, वे पौधे आखिर गए कहां?
विकास की दौड़ में गायब हो रही हरियाली
ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों के नाम पर करोड़ों रुपये की लागत से चौड़ी-चौड़ी सड़कें बनाई जा रही हैं, लेकिन इनके किनारे व्यवस्थित वृक्षारोपण नहीं किया जा रहा। परिणामस्वरूप सड़कें तो बन रही हैं, लेकिन पर्यावरणीय संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है। अनेक स्थानों पर सड़क निर्माण के दौरान पुराने वृक्षों की कटाई तो कर दी जाती है, परंतु उनके बदले नए पौधे लगाए जाने का दावा केवल कागजों तक सीमित रह जाता है।
होना चाहिए सामाजिक एवं प्रशासनिक ऑडिट
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि केवल वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लगाए गए पौधों की कम से कम पांच वर्षों तक नियमित निगरानी और उनका सामाजिक ऑडिट होना चाहिए। प्रत्येक पौधे को भू-अभिलेख और डिजिटल रिकॉर्ड से जोड़कर उसकी जीवित स्थिति का वार्षिक सत्यापन किया जाना आवश्यक है।