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सिरमौर में कार्यवाहक वनपाल ₹78 हजार रिश्वत लेते गिरफ्तार, सवाल बरकरार—क्या भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी सिर्फ छोटे कर्मचारियों की है? |
रीवा - मध्य प्रदेश में लोकायुक्त की कार्रवाई का सिलसिला लगातार जारी है, लेकिन हर बार एक बड़ा सवाल भी पीछे छोड़ जाता है। इस बार रीवा जिले के सिरमौर वन परिक्षेत्र कार्यालय में लोकायुक्त पुलिस ने कार्यवाहक वनपाल दिनेश कुमार को ₹78 हजार की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। आरोप है कि उन्होंने लकड़ी से लदे ट्रक को छोड़ने और उस पर लगाए जाने वाले जुर्माने की राशि कम कराने के एवज में रिश्वत की मांग की थी। कार्रवाई के बाद वन विभाग में हड़कंप मच गया, लेकिन एक बार फिर बहस इस बात पर शुरू हो गई कि आखिर भ्रष्टाचार की जवाबदेही केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक ही क्यों सीमित रह जाती है।
जानकारी के अनुसार शिकायतकर्ता नीरज यादव, निवासी मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश), लकड़ी से लदा ट्रक लेकर जा रहे थे। 6 जुलाई को वन चौकी त्यौथर पर वन विभाग ने उनके ट्रक को जब्त कर लिया था। ट्रक छुड़ाने के लिए जब उन्होंने सिरमौर वन परिक्षेत्र कार्यालय में संपर्क किया तो कार्यवाहक वनपाल दिनेश कुमार ने ट्रक छोड़ने और जुर्माना कम कराने के बदले ₹78 हजार की रिश्वत की मांग की। परेशान होकर शिकायतकर्ता ने लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक कार्यालय रीवा में शिकायत दर्ज कराई।
लोकायुक्त टीम ने शिकायत का गोपनीय सत्यापन कराया, जिसमें रिश्वत मांगे जाने की पुष्टि होने पर योजनाबद्ध तरीके से ट्रैप की कार्रवाई की गई। तय योजना के अनुसार शिकायतकर्ता जैसे ही रिश्वत की राशि लेकर कार्यालय पहुंचा और आरोपी ने रकम स्वीकार की, उसी समय लोकायुक्त टीम ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया। मौके से आवश्यक साक्ष्य जुटाकर आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज कर वैधानिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
इस कार्रवाई के बाद वन विभाग में हलचल तेज हो गई है। सरकारी कार्यालय में खुलेआम रिश्वत लेते एक जिम्मेदार अधिकारी का पकड़ा जाना विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लोकायुक्त पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और ट्रक जब्ती, जुर्माने की प्रक्रिया तथा अन्य संबंधित दस्तावेजों की भी जांच की जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने वाले कर्मचारी तक ही सीमित होता है? यदि किसी कार्यालय में लंबे समय से भ्रष्टाचार की शिकायतें आती रही हैं, तो संबंधित कार्यालय प्रमुख, परिक्षेत्र अधिकारी अथवा विभागीय वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं की जाती? छोटे कर्मचारी लोकायुक्त की कार्रवाई में दोषी पाए जाते हैं, लेकिन संस्था प्रमुख की जिम्मेदारी क्यों नहीं तय की जाती? यदि प्रत्येक भ्रष्टाचार के मामले में विभागाध्यक्ष और निगरानी तंत्र की जवाबदेही भी निर्धारित हो, तो संभव है कि भ्रष्टाचार पर अधिक प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।
दैनिक आज तक लंबे समय से भ्रष्टाचार के मुद्दे को प्रमुखता से उठाता रहा है। जब देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, मुख्यमंत्री और संबंधित विभाग पारदर्शी एवं भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की बात करते हैं, तब यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर इस भ्रष्टाचार की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी कौन लेगा? मध्य प्रदेश में आए दिन लगभग हर विभाग में लोकायुक्त की कार्रवाई सामने आती है, लेकिन यदि जिम्मेदारी केवल रिश्वत लेते पकड़े गए कर्मचारी तक सीमित रहेगी और शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तो भ्रष्टाचार की जड़ें समाप्त करना आज भी सबसे बड़ी चुनौती बना रहेगा।
