शहडोल; गोहपारू सेंट्रल बैंक: चपरासी का 'साम्राज्य', मैनेजर से ऊपर चलता है हुक्म; ऋण दिलाने के नाम पर 15 हजार की मांग का आरोप
शहडोल/गोहपारू - क्या सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की गोहपारू शाखा में बैंकिंग व्यवस्था आरबीआई के नियमों से नहीं, बल्कि एक चपरासी के इशारों पर चल रही है? बैंक की कार्यप्रणाली पर लग रहे इन गंभीर आरोपों ने न केवल विभागीय अनुशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि ग्राहकों के बीच बैंक की छवि को भी दांव पर लगा दिया है।
मैनेजर से ज्यादा चपरासी का 'सिक्का'
शिकायतकर्ताओं और स्थानीय सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार, वर्ष 2008 से इसी शाखा में पदस्थ एक चपरासी कथित तौर पर खुद को बैंक का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति मानता है। आरोप है कि बैंक आने वाले सीधे-साधे ग्रामीणों और ग्राहकों को डराया-धमकाया जाता है। चपरासी का दबदबा इतना है कि वह खुलेआम कहता है— "यहां मेरा सिक्का चलता है, कोई भी काम कराना है तो पहले मुझसे मिलो, फिर मैनेजर काम करेंगे।"
यह स्थिति बैंकिंग प्रोटोकॉल का खुला उल्लंघन है। सवाल यह उठता है कि क्या बैंक प्रबंधन ने अपनी शक्तियां एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को सौंप दी हैं? आखिर क्यों ग्राहक शाखा प्रबंधक के बजाय एक कर्मचारी के सामने नतमस्तक होने को मजबूर हैं?
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना में भ्रष्टाचार की सेंध
सबसे गंभीर आरोप केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना को लेकर लग रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, रामखेलावन चौधरी, प्रेमलाल चौधरी और शिव प्रसाद चौधरी जैसे हितग्राहियों के ऋण प्रकरणों को आगे बढ़ाने के बदले कथित तौर पर 15,000 रुपये की अवैध मांग की गई।
हैरानी की बात यह है कि हितग्राहियों को यह कहकर गुमराह किया गया कि यह रकम "ऊपर के अधिकारियों" तक पहुंचानी पड़ेगी, तभी फाइल स्वीकृत होगी। यदि इन आरोपों में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो यह गरीब और जरूरतमंदों के हक पर सीधा डाका है।
आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है खेल?
एक ही शाखा में वर्षों से जमे रहने के कारण इस कर्मचारी के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि वह खुद को नियमों से ऊपर समझने लगा है। चर्चा है कि बैंक के भीतर एक मजबूत गठजोड़ काम कर रहा है। क्या बैंक के वरिष्ठ अधिकारी इस पूरी स्थिति से अनजान हैं? या फिर इस 'कमीशन खेल' की परतें ऊपर तक जुड़ी हुई हैं, जिसके कारण अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई?
निष्पक्ष जांच की दरकार
बैंकिंग व्यवस्था में बिचौलियों और ऐसे प्रभावकारी कर्मचारियों की सक्रियता वित्तीय प्रणाली के लिए घातक है। यदि पिछले कुछ वर्षों में स्वीकृत हुए ऋण प्रकरणों और हितग्राहियों के बयानों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो भ्रष्टाचार के कई बड़े राज खुल सकते हैं।
क्षेत्र की जनता अब बैंक प्रबंधन और जिला प्रशासन से सवाल पूछ रही है:
क्या गोहपारू शाखा में बैंकिंग नियमों से बड़ा एक कर्मचारी का रसूख है?
क्या सरकारी योजनाओं के नाम पर गरीबों को लूटने वालों पर गाज गिरेगी?
क्या बैंक के उच्च अधिकारी इस भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाएंगे?
अब देखना होगा कि इस सनसनीखेज खुलासे के बाद सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का क्षेत्रीय कार्यालय क्या रुख अपनाता है। क्या सच में जांच होगी या मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?