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| तंबाकू निषेध के दावों के बीच फल-फूल रहा नशे का काला कारोबार: 'गोगा' पैकेट की आड़ में ₹10 का माल ₹50 में बिक रहा Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - एक तरफ सरकारें 'विश्व तंबाकू निषेध दिवस' जैसे मौकों पर लाखों-करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाकर नशामुक्ति का ढिंढोरा पीटती हैं, तो दूसरी तरफ धरातल पर हकीकत इसके ठीक उलट और बेहद खौफनाक नजर आती है। मध्य प्रदेश के रीवा संभाग सहित नवगठित मऊगंज जिले में इन दिनों नशे का एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसने युवा पीढ़ी और खासकर मजदूर वर्ग को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
'गोगा पैकेट' की आड़ में गांजे का खेल
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, संभाग के शहरी और ग्रामीण इलाकों की हर पांचवीं गुमटी या किराना दुकान पर 'गोगा' (प्री-रोल्ड कोन पेपर) आसानी से उपलब्ध है। कहने को तो यह सिर्फ एक खाली कागज का शंकु (कोन) है, लेकिन हकीकत यह है कि इसकी आड़ में गांजे और अन्य नशीले पदार्थों की खुल्लम-खुल्ला बिक्री की जा रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस पैकेट पर प्रिंटेड एमआरपी (MRP) महज ₹10 है, उसे ब्लैक में ₹50 तक में बेचा जा रहा है। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि इस अवैध कारोबार को संरक्षण देने और रफा-दफा करने के लिए हर स्तर पर 'सेवा शुल्क' (अवैध वसूली) का खेल भी बदस्तूर जारी है।
सरकार का 'त्रिकोणीय' मुनाफे का गणित!
जनचर्चा और जानकारों का मानना है कि सरकार की नशामुक्ति की मंशा कभी साफ रही ही नहीं। एक तरफ जागरूकता के नाम पर सरकारी बजट ठिकाने लगाया जाता है, वहीं दूसरी तरफ तंबाकू और उससे निर्मित जानलेवा सामग्रियों पर मोटा टैक्स वसूलकर खुलेआम बेचने की छूट दी जाती है। इस पूरे चक्रव्यूह में अप्रत्यक्ष रूप से एक 'त्रिकोणीय मुनाफे' का गणित काम करता है:
पहला फायदा: तंबाकू और नशीली चीजों की धड़ल्ले से बिक्री करवाकर भारी-भरकम टैक्स वसूलना।
दूसरा फायदा: इसके सेवन से जब लोग बीमार पड़ते हैं, तो दवाओं के बाजार और फार्मा कंपनियों का टर्नओवर बढ़ना।
तीसरा फायदा: अस्पतालों और डॉक्टरों की मोटी फीस के जरिए चिकित्सा क्षेत्र में पैसों का रोटेशन होना।
निम्न और मध्यम वर्ग निशाने पर
आज की तारीख में रीवा और मऊगंज जिले में राजश्री, बीड़ी, सिगरेट और देसी थर्रा (कच्ची शराब) का कारोबार करोड़ों में नहीं बल्कि अरबों रुपए तक पहुंच चुका है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस जानलेवा शौक की शिकार देश की वह 70% गरीब और मजदूर आबादी हो रही है, जो दिनभर खून-पसीना बहाकर कमाती है और शाम को अपनी गाढ़ी कमाई इस नशे के दलदल में झोंक देती है। निम्न और मध्यम वर्ग के परिवारों में यह नशा अब उनकी 'प्रमुख मांग' और मजबूरी जैसा बनता जा रहा है, जिससे अनगिनत घर तबाह हो रहे हैं।
प्रशासनिक मौन पर उठते सवाल
जब यह बात पूरे संभाग में जगजाहिर है और गली-कूचों की दुकानों तक यह 'गोगा नेटवर्क' फैला हुआ है, तो जिम्मेदार अधिकारी अनजान कैसे बने रह सकते हैं? कागजी आंकड़ों में नशामुक्ति का संकल्प दोहराने वाला प्रशासन धरातल पर इस अवैध सप्लाई चेन को तोड़ने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। यदि वक्त रहते इस पर कड़ा प्रहार नहीं किया गया, तो विंध्य क्षेत्र की युवा आबादी को गर्त में जाने से कोई नहीं रोक पाएगा।
