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| रीवा; गांधी जी के पंचायती राज का सपना भ्रष्टाचार की भेंट: रीवा और मऊगंज की पंचायतों में जांच के नाम पर 'लीपापोती' जारी |
रीवा/मऊगंज - राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 'ग्राम स्वराज' और 'पंचायती राज' की परिकल्पना ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर, सशक्त और पारदर्शी बनाने के लिए की थी। लेकिन आज जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है। मध्य प्रदेश शासन की यह बेहद महत्वाकांक्षी योजना रीवा और मऊगंज जिलों के कुछ हिस्सों में भ्रष्ट तंत्र की जुगलबंदी के कारण 'मिल-बांटकर खाने' का मुख्य केंद्र बिंदु बनती जा रही है। हालांकि, इस निराशाजनक माहौल के बीच दोनों ही जिलों में कुछ ऐसे निष्ठावान और ईमानदार सरपंच भी हैं, जो अपनी जेब से पूंजी लगाकर जनता की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं। परंतु इसके उलट, अधिकांश जनपद क्षेत्रों की पंचायतों में संबंधित जनपद अधिकारियों, तकनीकी अमले और पंचायत सचिवों के गठजोड़ से व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार का खेल धड़ल्ले से चल रहा है।
सिरमौर के वीडियो ने उजागर की जमीनी हकीकत
हाल ही में रीवा जिले के सिरमौर क्षेत्र से एक ऐसा वीडियो सामने आया है, जिसने भ्रष्टाचार की जांच करने वाले अधिकारियों की पूरी कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो को देखकर साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि धरातल पर वित्तीय अनियमितताओं और घटिया निर्माण कार्यों की जांच के नाम पर किस तरह केवल दफ्तरों में बैठकर खानापूर्ति और 'लीपापोती' की जा रही है। कमोबेश यही हाल दोनों जिलों की अधिकांश जनपद पंचायतों का बना हुआ है, जहाँ शिकायत के बाद भी दोषियों पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं होती।
कलेक्टर्स का खौफ बेअसर, निचले अमले में सुधार नहीं
वर्तमान समय में रीवा और नवनिर्मित जिला मऊगंज के कलेक्टर्स की कार्यप्रणाली पूरी तरह से जनहितैषी और भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन देने की रही है। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की मंशा और उनकी ईमानदारी पर कोई संदेह नहीं है, और वे लगातार कड़े कदम भी उठा रहे हैं। लेकिन चिंताजनक पहलू यह है कि निचले स्तर के रसूखदार कर्मचारी आज भी अपनी पुरानी आदतों से बाज नहीं आ रहे हैं और वरिष्ठ अधिकारियों की साख को बट्टा लगा रहे हैं।
पत्रकारिता दृष्टिकोण: जब तक गाज नहीं गिरेगी, तब तक नहीं सुधरेंगे हालात
धरातल से सामने आ रही तस्वीरें और वीडियो यह सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि जिला कलेक्टर्स का जितना खौफ और दबाव निचले स्तर के मैदानी अमले पर होना चाहिए, वह पूर्ण रूप से प्रभावी नहीं दिख रहा है। हालांकि, कलेक्टर्स के कड़े रुख के कारण प्रशासनिक हलकों में कुछ डर तो जरूर है, लेकिन जब तक 'लीपापोती' करने वाले इन जांच अधिकारियों और भ्रष्ट सचिवों पर सीधे निलंबन और एफआईआर (FIR) जैसी गाज नहीं गिरेगी, तब तक धरातल पर गांधी जी का 'ग्राम स्वराज' का सपना साकार होना मुमकिन नहीं दिखता।
