भोपाल; पुरातत्व धरोहरों के प्रति देश की युवा पीढ़ी को जागरूक करना ही अब मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य: पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास

भोपाल; पुरातत्व धरोहरों के प्रति देश की युवा पीढ़ी को जागरूक करना ही अब मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य: पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास

भोपाल - मध्य प्रदेश के भीमबैठका, विश्व प्रसिद्ध सांची स्तूप और गुजरात की ऐतिहासिक 'रानी की वाव' जैसे वैश्विक धरोहरों के संरक्षण में अपना संपूर्ण जीवन होम करने वाले प्रख्यात पुरातत्वविद डॉ. नारायण व्यास को हाल ही में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक 'पदमश्री' से नवाजा गया है। रायसेन जिले में 'ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया' (प्राचीन विशाल दीवार) की ऐतिहासिक खोज में बहुमूल्य योगदान देने वाले डॉ. व्यास से प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार खोबरे ने उनके जीवन, संघर्ष और पुरातत्व के प्रति उनके अटूट समर्पण को लेकर एक खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस अनूठे साक्षात्कार के मुख्य अंश:

पद्मश्री मिलने के बाद भी सादगी वही: "मैं जैसा पहले था, आज भी वैसा ही हूँ"

प्रश्न: देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक 'पदमश्री' मिलने के बाद आपको कैसा लग रहा है और जीवन में क्या बदलाव महसूस करते हैं?

उत्तर: देखिए, भारत सरकार और महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा इतना बड़ा सम्मान मिलना निश्चित रूप से मेरे लिए अत्यंत गौरव की बात है। मुझे भीतर से बहुत अच्छा लग रहा है कि मेरे जीवनभर के काम को राष्ट्र ने सराहा। रही बात बदलाव की, तो सम्मान मिलने के बाद मेरे भीतर किसी भी प्रकार का कोई व्यक्तिगत बदलाव नहीं आया है। मैं जैसा कल था, वैसा ही आज हूँ। मेरी सादगी और काम के प्रति निष्ठा वैसी ही रहेगी।

बैंक और एलआईसी की नौकरी छोड़, डॉ. वाकणकर के सानिध्य में बदला जीवन का रास्ता

प्रश्न: आपकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ से हुई और पुरातत्व जैसे जटिल क्षेत्र के प्रति आपका रुझान कैसे बढ़ा? क्या इस क्षेत्र में आने से पहले आपने कहीं और भी काम किया?

उत्तर: मेरी प्रारंभिक से लेकर उच्च शिक्षा उज्जैन में संपन्न हुई। वर्ष 1970 में मैंने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विषय में एम.ए. किया। इसके बाद 1972 में दिल्ली स्थित 'स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी' से पुरातत्व में पी.जी. डिप्लोमा किया। आगे चलकर 1992 में गुजरात के पाटन की 'रानी की वाव' पर मैंने पीएचडी की और 2005 में भोपाल में शैलचित्रों पर डी.लिट की उपाधि प्राप्त की।

जहाँ तक नौकरी का सवाल है, तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) विभाग में आने से पहले मैंने एडहॉक (तदर्थ) पर एलआईसी (LIC) और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) में भी कुछ समय सर्विस की थी।

प्रश्न: आपके जीवन का 'टर्निंग पॉइंट' आप किस व्यक्ति या घटना को मानते हैं?

उत्तर: मेरे जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट महान पुरातत्वविद डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर जी के संपर्क में आना रहा। उनके अद्भुत व्यक्तित्व के प्रभाव से ही मेरा इतिहास और पुरातत्व के प्रति लगाव इतना गहरा हुआ कि मैंने बैंक और एलआईसी के सुरक्षित करियर को छोड़कर इस क्षेत्र में आने का फैसला किया। डिप्लोमा पूरा होने के बाद वाकणकर जी ने मुझे भीमबैठका में उनके साथ काम करने का अवसर दिया। मैंने उनके सानिध्य में लगभग 10 किलोमीटर का अत्यंत दुर्गम पुरातत्त्वीय सर्वेक्षण किया, जिसमें हमने 500 से अधिक चित्रित शैलाश्रयों (रॉक शेल्टर्स) को खोजा और उन पर शोध किया।

सेवानिवृत्ति के बाद की 'दूसरी पारी': स्वतंत्र खोजें और प्रदर्शनियों का सफर

प्रश्न: अमूमन लोग सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) के बाद आराम करना पसंद करते हैं, लेकिन आप आज भी निरंतर सक्रिय हैं। इस दूसरी पारी को लेकर क्या सोचा है?

उत्तर: हर मनुष्य का अपना स्वभाव होता है, मैं खाली नहीं बैठ सकता। सेवानिवृत्त होने के अगले ही दिन से मैंने स्वतंत्र रूप से पुरातत्व के क्षेत्र में फील्ड वर्क शुरू कर दिया था। इस दौरान मैंने कई नए पुरावशेषों और ऐतिहासिक धरोहरों की खोज की। अब मेरा मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों, शोधार्थियों और आम लोगों में अपनी प्राचीन धरोहरों के प्रति विभिन्न माध्यमों से जागरूकता पैदा करना है।

प्रश्न: धरोहरों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए आप अब तक कहाँ-कहाँ प्रदर्शनियां लगा चुके हैं और इनमें क्या खास होता है?

उत्तर: मैंने अब तक देश के विभिन्न हिस्सों में 50 से अधिक प्रदर्शनियां लगाई हैं। इनमें भोपाल, कोलार, उज्जैन, इंदौर, मांडव, भीमबैठका, सांची, नर्मदापुरम, खजुराहो के स्कूल-कॉलेज और दिल्ली के 'इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र' (IGNCA) में दो बार लगाई गई प्रदर्शनियां शामिल हैं। इन प्रदर्शनियों में आदिमानव द्वारा निर्मित पत्थर के प्रागैतिहासिक हथियार, प्राचीन मिट्टी के पात्र (मृदभांड), ऐतिहासिक सिक्के, पुरानी दुर्लभ पुस्तकें, ऐतिहासिक समाचार पत्र और डाक टिकट प्रदर्शित किए जाते हैं।

इसके साथ ही, मैंने देश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की पावन जन्मस्थली की मिट्टी को एकत्रित कर "इस मिट्टी से तिलक करो, ये धरती है बलिदान की" थीम पर एक राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत प्रदर्शनी भी लगाई है, जिसका समाज पर गहरा असर पड़ा।

पद्मश्री ने बढ़ाई नैतिक जिम्मेदारी, पत्नी का मिला हर कदम पर साथ

प्रश्न: आपको अब तक कौन-कौन से बड़े राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं? अब पद्मश्री मिलने के बाद समाज और राष्ट्र के लिए क्या योजना है?

उत्तर: मुझे पूर्व में मध्य प्रदेश शासन द्वारा पुरातत्व के क्षेत्र का सर्वोच्च 'राष्ट्रीय वाकणकर सम्मान' मिल चुका है। इसके अलावा चित्रकला के क्षेत्र में भी पुरस्कार मिले हैं और मेरा नाम 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' में भी दर्ज है।

अब चूंकि मुझे पद्मश्री मिल गया है, तो निश्चित तौर पर मेरी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी बहुत बढ़ गई है। धरोहरों के संरक्षण और जागरूकता के काम को अब मुझे पहले से कहीं अधिक गति से आगे बढ़ाना होगा। इस पूरे सफर में मेरी धर्मपत्नी साधना व्यास की बेहद अहम भूमिका रही है। वे स्वयं एक कुशल पुरातत्ववेत्ता हैं, इसलिए वे कदम-कदम पर फील्ड से लेकर रिसर्च तक मेरा पूरा सहयोग करती हैं।

रील्स और मोबाइल में डूबे युवाओं के लिए खास संदेश

प्रश्न: आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया, मोबाइल और रील्स की दुनिया में खोई हुई है। पुरातत्व और इतिहास को लेकर उनके लिए आपका क्या संदेश है?

उत्तर: मैं नई पीढ़ी और देश के युवाओं से यही कहना चाहूँगा कि हमारी यह ऐतिहासिक धरोहरें हमारे पूर्वजों द्वारा दी गई अनमोल वसीयत हैं। हमारा अध्ययन या करियर का विषय भले ही कोई भी हो—चाहे हम साइंस पढ़ें या कॉमर्स, लेकिन हम सबकी सांस्कृतिक धरोहर एक ही है। युवाओं को इसके प्रति जागरूक और संवेदनशील होना होगा, ताकि हमारी भावी पीढ़ी अपनी गौरवशाली जड़ों से कटी न रहे और इस अनमोल विरासत से लाभान्वित हो सके। अपनी धरोहरों का सम्मान करना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।



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