रीवा; जनसेवकों की 'व्यावसायिक' लिप्तता और तंत्र के लचीलेपन से बेहाल रीवा संभाग, भ्रष्टाचार की 'हांडी' में उबल रही जनता

रीवा; जनसेवकों की 'व्यावसायिक' लिप्तता और तंत्र के लचीलेपन से बेहाल रीवा संभाग, भ्रष्टाचार की 'हांडी' में उबल रही जनता

रीवा - सफेद शेरों की भूमि और अपनी समृद्ध व गरिमापूर्ण राजनैतिक विरासत के लिए देश-प्रदेश में पहचाने जाने वाले रीवा संभाग (विंध्य क्षेत्र) में वर्तमान समय में सत्ता का मिजाज और परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। जो राजनीति कभी समाज के अंतिम व्यक्ति की सेवा का माध्यम हुआ करती थी, वह आज एक संगठित और मुनाफे वाले 'व्यवसाय' का रूप ले चुकी है। संभाग के अधिकांश जनसेवक, माननीय विधायक और सांसद, जनता की बुनियादी और रोजमर्रा की समस्याओं को दरकिनार कर अपने निजी व्यापार और जमीनों की खरीद-फरोख्त (प्रॉपर्टी डीलिंग) के सिंडिकेट में व्यस्त हैं। नेताओं द्वारा पाले गए उनके 'खास कारिंदे' और गुर्गे इस पूरे जमीनी खेल को प्रशासनिक शह पर धड़ल्ले से अंजाम दे रहे हैं।

भ्रष्टाचार की 'हांडी' का हर चावल है दागदार

कहते हैं कि हांडी का एक ही चावल पूरा सच परखने के लिए काफी होता है, और रीवा संभाग में संस्थागत हो चुके भ्रष्टाचार की बानगी देखने के लिए हालिया दिनों में सामने आए कुछ बड़े प्रशासनिक मामले ही पर्याप्त हैं। संभाग का कोई भी ऐसा शासकीय विभाग नहीं बचा है, जहाँ भ्रष्टाचार की चर्चाएं आम बात न हो चुकी हों। समय-समय पर होने वाली लोकायुक्त की ताबड़तोड़ ट्रैप कार्यवाहियां इस बात का सबसे बड़ा और जीवंत प्रमाण हैं।

अगर संभाग के प्रमुख विभागों पर नजर डालें तो सच स्वतः उजागर हो जाता है:

  • शिक्षा विभाग: नियुक्तियों से लेकर निर्माण कार्यों और भारी वित्तीय अनियमितताओं तक, यह विभाग पूरी तरह भ्रष्टाचार के दलदल में धंसा हुआ है।

  • स्वास्थ्य विभाग: दवाओं और उपकरणों की खरीदी के साथ-साथ स्वास्थ्य सुविधाओं के ऊंचे दावों के पीछे बड़े घोटाले की परतें खुल रही हैं।

  • परिवहन और आबकारी विभाग: इन मलाईदार विभागों की कार्यप्रणाली और नाकों पर होने वाली अवैध वसूली पर अब कोई बात तक करना मुनासिब नहीं समझता, क्योंकि यहाँ भ्रष्टाचार पूरी तरह सिस्टम का हिस्सा बन चुका है।

  • खनिज विभाग: संभाग की अमूल्य खनिज संपदा पर भू-माफियाओं और राजनेताओं की अवैध नजरें टिकी हुई हैं, जिसकी गूंज प्रशासनिक गलियारों में आम है।

2004 के बाद पनपा 'भू-माफिया तंत्र', शासकीय जमीनों पर नजर

रीवा संभाग पारंपरिक रूप से सामान्य बाहुल्य क्षेत्र माना जाता है, और इसी कोटे के अंतर्गत ज्यादातर जनप्रतिनिधि यहाँ की जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि वर्ष 2004 के बाद से रीवा में विवादित जमीनों को औने-पौने दामों पर डरा-धमका कर खरीदने और फिर राजनैतिक रसूख के दम पर उन्हें महंगे दामों में बेचने का एक नया खौफनाक 'सिंडिकेट' खड़ा हो गया है। नेताओं की विशेष अनुकंपा, पुलिस के दबाव और राजस्व न्यायालयों की रहस्यमयी उदासीनता ने इन भू-माफियाओं के मनोबल को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है। स्थिति इतनी विकट है कि आज भी कई प्रतिष्ठित शासकीय और सामाजिक संस्थानों की प्रमुख जमीनों का नामांतरण (म्यूटेशन) उन संस्थाओं के नाम पर नहीं हो पाया है, और भू-माफिया उन जमीनों पर फर्जी कागजात के सहारे दूसरी संस्थाएं खड़ी कर उन्हें खुर्द-बुर्द करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।

कलेक्टर्स की कार्यप्रणाली बनाम सत्ता के दलाल

संभाग के प्रशासनिक तंत्र पर गौर करें तो रीवा, सीधी और मऊगंज के जिला कलेक्टर्स की कार्यप्रणाली वर्तमान में आम जनमानस के बीच गहरी चर्चा का विषय बनी हुई है। अधिकांश मामलों में देखा गया है कि सत्ता के बेहद करीबी जनप्रतिनिधियों के इशारे पर कई अधिकारी नियम-विरुद्ध कार्यों का खुलकर विरोध नहीं कर पाते, बल्कि मजबूरी में मौन सहमति दे देते हैं। पूर्व में वर्तमान जिला कलेक्टर का भी जनप्रतिनिधियों के इशारे पर विरोध देखा गया था। हो सकता है कि जिला कलेक्टर्स की व्यक्तिगत कड़ाई के कारण भू-माफियाओं के मंसूबे पूरी तरह कामयाब न हो पा रहे हों, लेकिन राजस्व और पुलिस प्रशासन का निचला लचीलापन और भ्रष्टाचारियों को मिलने वाला अंदरूनी सहयोग ऐसे विधि-विरुद्ध (अवैध) कार्यों को आसानी से संपन्न करा देता है। दूसरी तरफ, विभागों में कुंभकर्णी नींद सो रहे आला अधिकारी और दलाल इस पूरे तंत्र पर हावी हैं।

जब रक्षक ही भक्षक, तो कहाँ जाए गरीब?

आज विंध्य की पीड़ित, शोषित और लाचार जनता के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि वह अपने साथ हो रहे अन्याय की 'आह' और न्याय की गुहार लेकर आखिर किसके पास जाए? जब सूबे के शीर्ष नेतृत्व के दरबार में बैठे मंत्री और उनके खास रणनीतिकार व सलाहकार ही इस तरह के अनैतिक गठजोड़ में लिप्त दिखाई देते हों, तो आम आदमी का सिस्टम और लोकतंत्र से भरोसा उठना लाजिमी है। रीवा संभाग की यह बदहाल और संवेदनहीन तस्वीर सत्ता और व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे कर्णधारों के लिए एक गंभीर आत्ममंथन का विषय है।

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