रीवा; कागजों पर दौड़ रही कुपोषण मुक्ति की योजनाएं; रीवा संभाग में 'पोषण आहार' के नाम पर प्रतिमाह करोड़ों का 'खेल'

रीवा; कागजों पर दौड़ रही कुपोषण मुक्ति की योजनाएं; रीवा संभाग में 'पोषण आहार' के नाम पर प्रतिमाह करोड़ों का 'खेल' 

रीवा - संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) और भारत सरकार की मंशानुसार देश को कुपोषण के कलंक से मुक्ति दिलाने के लिए चलाई जा रही तमाम महत्वाकांक्षी योजनाएं रीवा संभाग में केवल महिला बाल विकास विभाग के सरकारी अभिलेखों और फाइलों तक ही सीमित होकर रह गई हैं। विंध्य क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों से आ रही जमीनी हकीकत बेहद चौंकाने वाली है। यहाँ संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों पर धात्री महिलाओं, किशोरी बालिकाओं और 3 से 6 वर्ष के मासूम नौनिहालों के नाम पर सिर्फ कागजी और काल्पनिक आंकड़े तैयार किए जा रहे हैं, ताकि हर महीने आने वाले करोड़ों रुपये के सरकारी बजट को ठिकाने लगाया जा सके।

सत्ताधारियों के 'करीबियों' के हाथों में पोषण आहार का ठेका

संभाग के जिलों में कुपोषण मिटाने के लिए टेक होम राशन (THR) और गर्म पके भोजन की कमान जिन स्व-सहायता समूहों और ठेकेदारों को सौंपी गई है, उनका ढांचा खुद बड़े सवालों के घेरे में है। सूत्रों और जन-चर्चाओं की मानें तो इन समूहों और सप्लायरों में से लगभग 90 प्रतिशत सीधे तौर पर सत्ताधारी दल के कद्दावर नेताओं और रसूखदारों के बेहद करीबी हैं।

विभागीय नियमों और कुपोषण से लड़ने के दावों के विपरीत, इन रसूखदार ठेकेदारों का पूरा ध्यान जमीनी स्तर पर गुणवत्तापूर्ण भोजन पहुंचाने के बजाय अपने राजनैतिक आकाओं की मंच व्यवस्था संभालने, पार्टी कार्यक्रमों के आयोजन और माननीयों के स्वागत-सत्कार के प्रबंधों में लगा रहता है। नेताओं के इस सीधे संरक्षण के कारण महिला बाल विकास विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और मैदानी पर्यवेक्षक भी इन पर किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई करने या इनका ठेका निरस्त करने से कतराते हैं।

कुपोषितों और गरीबों के हक पर डाका: क्या कलेक्टर्स करेंगे गोपनीय जांच?

आज विंध्य क्षेत्र की जागरूक जनता के बीच सबसे बड़ा और संवेदनशील सवाल यह उठ रहा है कि कुपोषित बच्चों और निर्धन परिवारों के मुंह का निवाला छीनने वाले इस संगठित सिंडिकेट पर क्या रीवा संभाग के जिला कलेक्टर्स की नजर पड़ेगी? क्या इस गंभीर मानवीय मुद्दे पर प्रशासन द्वारा कोई उच्च स्तरीय या गोपनीय जांच दल गठित किया जाएगा?

विभागीय जानकारों और सूत्रों का साफ कहना है कि यदि केवल दो-चार ब्लॉकों की भी निष्पक्षता और बिना किसी राजनैतिक दबाव के जांच हो जाए, तो महिला बाल विकास विभाग के अधिकारियों और इन रसूखदार समूहों के बीच चल रहा प्रतिमाह करोड़ों-करोड़ रुपये का महाभ्रष्टाचार बेनकाब हो सकता है। यह घोटाला न सिर्फ शासकीय धन की सरेआम चपत है, बल्कि अंचल के नौनिहालों के स्वास्थ्य और उनके भविष्य के साथ किया जा रहा एक क्रूर और अमानवीय मजाक भी है।

'आज तक 24' लगातार कर रहा है भ्रष्टाचार का भंडाफोड़

क्षेत्रीय समाचार नेटवर्क 'आज तक 24' इस तरह के जनविरोधी, जनविरोधी नीतियों और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मामलों को समय-समय पर प्रमुखता के साथ उठाता रहा है। शासन और प्रशासन के संज्ञान में इन गंभीर विसंगतियों को लाने का कार्य मीडिया लगातार अपनी सामाजिक जिम्मेदारी मानकर कर रहा है।

जमीनी हकीकतों, जन-आक्रोश और पूर्व में सामने आई छिटपुट प्रशासनिक कार्यवाहियों के आधार पर यह पूरी तरह स्पष्ट है कि यदि रीवा संभाग के आला अधिकारियों और जिला कलेक्टर्स ने इस दिशा में तत्काल कोई कड़ा और दंडात्मक रुख नहीं अपनाया, तो कागजों पर तो संभाग कुपोषण मुक्त दर्ज हो जाएगा, लेकिन हकीकत में गरीब और मासूम बच्चे बुनियादी पोषण के एक-एक दाने के लिए तरसते रहेंगे।

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