मुरैना; माँ मुस्कुराएगी तभी बच्चा स्वस्थ होगा!” जौरा अस्पताल में मानसिक स्वास्थ्य पर चला खास अभियान

मुरैना; माँ मुस्कुराएगी तभी बच्चा स्वस्थ होगा!” जौरा अस्पताल में मानसिक स्वास्थ्य पर चला खास अभियान 

मुरैना - मातृत्व केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी स्वस्थ हो, इसी उद्देश्य को लेकर सिविल हॉस्पिटल जौरा में “मनमेला” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं के मानसिक स्वास्थ्य की जांच पीएचक्यू-9 स्क्रीनिंग के माध्यम से की गई। आयोजन का उद्देश्य महिलाओं में मानसिक तनाव, अवसाद और भावनात्मक समस्याओं की समय रहते पहचान कर उचित परामर्श और सहायता उपलब्ध कराना रहा। कार्यक्रम में आशा कार्यकर्ताओं को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी विभिन्न योजनाओं और तकनीकी माध्यमों की जानकारी दी गई। उन्हें मनकक्ष, टेलीमानस और मनहित ऐप के उपयोग और महत्व के बारे में विस्तार से समझाया गया, ताकि वे गांव स्तर पर जरूरतमंद महिलाओं की पहचान कर समय पर मदद पहुंचा सकें।

मनकक्ष प्रभारी अमृत राजे ने बताया कि गर्भावस्था और प्रसव के बाद महिलाओं में मानसिक तनाव और डिप्रेशन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण अधिकांश मामले सामने नहीं आ पाते। उन्होंने कहा कि समय पर पहचान और काउंसलिंग से महिलाओं को गंभीर मानसिक समस्याओं से बचाया जा सकता है। कार्यक्रम में सिविल हॉस्पिटल जौरा के मुख्य खंड चिकित्सा अधिकारी आर.एस. सेमिल, बीपीएम महेंद्र पाल सिंह, बीसीएम मधु सेमिल, आईसीटीसी काउंसलर संदीप सेंगर सहित कई स्वास्थ्य अधिकारी मौजूद रहे।

संगत संस्था की जिला समन्वयक निवेदिता अग्रवाल ने आशा कार्यकर्ताओं को काउंसलिंग स्किल्स की ट्रेनिंग देते हुए बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अब भी झिझक और डर का माहौल है, जिसे जागरूकता के माध्यम से बदलना जरूरी है। कार्यक्रम में संगत टीम की डॉ. राशि, रूबी शुक्ला, सतेंद्र बैरागी और बिंदु ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। आयोजन को मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और जमीनी स्तर पर सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में अहम पहल माना जा रहा है।

आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल

  1. ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी के बीच क्या सिर्फ जागरूकता कार्यक्रम पर्याप्त हैं, या सरकार विशेषज्ञ डॉक्टरों की स्थायी नियुक्ति भी करेगी?
  2. गर्भवती महिलाओं में डिप्रेशन और मानसिक तनाव के कितने मामले अब तक चिन्हित हुए हैं, और उनमें से कितनों को नियमित इलाज मिल रहा है?
  3. क्या आशा कार्यकर्ताओं पर लगातार बढ़ते काम के बोझ के बीच मानसिक स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील जिम्मेदारियां देना व्यावहारिक और प्रभावी साबित होगा?

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