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| रीवा में ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ का आगाज: कम पानी में अधिक मुनाफे का मंत्र Aajtak24 News |
रीवा/गंगेव -"किसान कल्याण वर्ष 2026" के तहत रीवा जिले में खेती के भविष्य को सुरक्षित और टिकाऊ बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। कलेक्टर एवं उपसंचालक कृषि के निर्देशन में संचालित “जल गंगा संवर्धन अभियान” के माध्यम से जिले के किसानों को अब कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसलों की ओर प्रेरित किया जा रहा है। इसी कड़ी में विकासखंड गंगेव के ग्राम सिरसा में कृषि विशेषज्ञों की टीम ने उन्नत खेती के मॉडलों का अवलोकन कर किसानों को जागरूक किया।
फसल विविधीकरण: सिरसा के किसान उमेश पाटीदार ने पेश की मिसाल
अभियान के तहत कृषि विभाग की टीम ने ग्राम सिरसा में प्रगतिशील किसान उमेश पाटीदार के फार्म का दौरा किया। यहाँ फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को प्राथमिकता देते हुए रबी और ग्रीष्मकालीन फसलों का बेहतरीन प्रदर्शन देखा गया। अवलोकन के दौरान पाया गया कि यहाँ सोयाबीन की उन्नत किस्म NRC 268 के साथ-साथ ग्रीष्मकालीन पंत उर्द, मूंग, मक्का और बरबटी की सफल खेती की जा रही है। यह मॉडल अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।
मिट्टी की सेहत और किसान की बरकत: विशेषज्ञों की राय
वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी शिवसरण सरल और आत्मा परियोजना के बीटीएम दीपक कुमार श्रीवास्तव सहित कृषि विस्तार अधिकारी स्वीकृति शुक्ला व युगल किशोर प्रधान ने कृषकों को वैज्ञानिक खेती के लाभ बताए। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि:
दलहनी फसलें (चना, मसूर, मूंग, उड़द): ये फसलें न केवल कम पानी में तैयार होती हैं, बल्कि वातावरण से नाइट्रोजन खींचकर भूमि की उर्वरा शक्ति को प्राकृतिक रूप से बढ़ाती हैं।
तिलहनी फसलें (सोयाबीन, सरसों, तिल, सूरजमुखी): खाद्य तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता के साथ-साथ ये फसलें किसानों की आय बढ़ाने में मील का पत्थर साबित हो रही हैं।
जल संरक्षण और आधुनिक तकनीक पर जोर
“जल गंगा संवर्धन अभियान” का मुख्य उद्देश्य गिरते भू-जल स्तर को रोकना है। इसके लिए विभाग किसानों को सूक्ष्म सिंचाई (Micro Irrigation), फसल चक्र (Crop Rotation) और कम जल खपत वाली फसलों के प्रति निरंतर जागरूक कर रहा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, फसल विविधीकरण से न केवल लागत कम होती है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता में भी अभूतपूर्व सुधार आता है।
कृषि विभाग की अपील: पारंपरिक से आधुनिकता की ओर बढ़ें
कृषि विभाग ने जिले के समस्त किसानों से अपील की है कि वे जल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक धान-गेहूं के चक्र से बाहर निकलकर दलहनी एवं तिलहनी फसलों को अपनाएं। इससे न केवल प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होगा, बल्कि पोषण सुरक्षा और टिकाऊ विकास का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
