राजनांदगांव; खाद की कमी नहीं, लेकिन खेती का गणित बदलेगा! अब किसानों को कम यूरिया और ज्यादा ‘स्मार्ट खेती’ की सलाह Aajtak24 News

राजनांदगांव; खाद की कमी नहीं, लेकिन खेती का गणित बदलेगा! अब किसानों को कम यूरिया और ज्यादा ‘स्मार्ट खेती’ की सलाह Aajtak24 News

राजनांदगांव - खरीफ सीजन 2026 से पहले राजनांदगांव जिले में खाद संकट की आशंकाओं के बीच कृषि विभाग ने बड़ा दावा किया है। प्रशासन का कहना है कि जिले में किसानों के लिए 36 हजार 509 टन से अधिक उर्वरकों का भंडारण किया जा चुका है और इस बार किसानों को केवल पारंपरिक रासायनिक खाद पर निर्भर रहने के बजाय “संतुलित और वैज्ञानिक खेती” अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। कृषि विभाग के अनुसार इस वर्ष सहकारी समितियों और निजी विक्रेताओं के पास यूरिया, डीएपी, पोटाश, एनपीके, एसएसपी, नैनो यूरिया और नैनो डीएपी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। विभाग का दावा है कि वर्तमान उपलब्धता पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक है।

उप संचालक कृषि श्री टीकम सिंह ठाकुर ने अधिकारियों और विक्रेताओं को निर्देश दिए हैं कि किसानों को खाद वितरण में किसी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए। शासन के निर्देशानुसार अब पॉश मशीन के माध्यम से खाद वितरण किया जा रहा है, ताकि खाद की कालाबाजारी और अनियमितता पर नियंत्रण रखा जा सके। कृषि विभाग इस बार किसानों को डीएपी के विकल्प के रूप में एनपीके खादों के उपयोग पर विशेष जोर दे रहा है। विभाग का कहना है कि किसान धान की फसल में डीएपी के स्थान पर 12:32:16, 20:20:0:13 और 16:16:16 जैसे एनपीके उर्वरकों का उपयोग कर यूरिया की खपत कम कर सकते हैं। साथ ही टॉप ड्रेसिंग के लिए नैनो यूरिया और नैनो डीएपी को बढ़ावा दिया जा रहा है।

इसी के साथ जिले में “धरती माता बचाओ अभियान” भी चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत किसानों को नील हरित शैवाल यानी ब्लू-ग्रीन एल्गी के उपयोग के लिए जागरूक किया जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक यह जैव उर्वरक खेतों में पानी भरे रहने की स्थिति में विकसित होता है और वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करने में मदद करता है। इससे रासायनिक यूरिया की आवश्यकता कम हो सकती है और मृदा स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है। कृषि विभाग के मैदानी अधिकारी गांव-गांव जाकर किसानों को नील हरित शैवाल उत्पादन और उसके उपयोग की जानकारी दे रहे हैं। प्रशासन का दावा है कि इससे खेती की लागत घटेगी और मिट्टी की उर्वरता भी लंबे समय तक बनी रहेगी। हालांकि हर साल की तरह इस बार भी सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या खाद वास्तव में जरूरतमंद किसानों तक समय पर और पर्याप्त मात्रा में पहुंच पाएगी या फिर बुवाई के चरम समय में किसानों को समितियों के चक्कर काटने पड़ेंगे।

आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल

  1. अगर जिले में खाद की उपलब्धता पिछले साल से 40 प्रतिशत अधिक है, तो क्या प्रशासन गारंटी देगा कि खरीफ सीजन में किसानों को खाद के लिए लाइनें और कालाबाजारी नहीं झेलनी पड़ेगी?
  2. सरकार नैनो यूरिया और जैव उर्वरकों को बढ़ावा दे रही है, लेकिन क्या किसानों को इनके वास्तविक परिणामों और संभावित जोखिमों पर पर्याप्त वैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया गया है?
  3. पॉश मशीन से खाद वितरण की बात हो रही है, तो क्या प्रशासन यह सार्वजनिक करेगा कि पिछले वर्षों में कितनी शिकायतें फर्जी वितरण और खाद की कालाबाजारी से जुड़ी मिली थीं और उन पर क्या कार्रवाई हुई?

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