दमोह; जनसुनवाई में सख्ती का नया दौर—आवेदन नहीं, अब लापरवाही पर सीधे निलंबन! Aajtak24 News

दमोह; जनसुनवाई में सख्ती का नया दौर—आवेदन नहीं, अब लापरवाही पर सीधे निलंबन! Aajtak24 News

दमोह - जिले की जनसुनवाई इस बार केवल शिकायतों के समाधान का मंच नहीं रही, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही तय करने का सख्त उदाहरण बन गई। कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने साफ कहा कि किसी भी स्थिति में आवेदकों को भटकने नहीं दिया जाएगा और हर आवेदन पर गंभीरता से कार्रवाई अनिवार्य होगी।

223 आवेदन, कई मौके पर ही निपटे

जनसुनवाई में कुल 223 आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें—

  • कई पुराने 1 से 2 वर्ष तक लंबित मामले शामिल थे
  • अधिकांश शिकायतें राजस्व, नगरीय प्रशासन और पंचायत विभाग से संबंधित थीं
  • कई मामलों का मौके पर ही निराकरण किया गया

कलेक्टर ने कहा कि यह संख्या दर्शाती है कि लोगों का प्रशासन पर भरोसा बढ़ा है।

लापरवाही पर सीधी कार्रवाई: 2 कर्मचारी निलंबित

जनसुनवाई में गंभीर अनियमितताओं पर कड़ी कार्रवाई की गई—

 1. पीएम आवास योजना में भ्रष्टाचार

  • ग्राम पंचायत पटना कुम्हारी के सचिव विजय खंपरिया
  • महिला हितग्राही से अवैध राशि लेने और गुमराह करने का आरोप
    👉 तत्काल प्रभाव से निलंबन

2. राजस्व विभाग में लापरवाही

  • पटवारी प्रिया श्रीवास्तव (हल्का 10, सोजना)
  • सीमांकन, तरमीम में लापरवाही
  • सीएम हेल्पलाइन शिकायत का गलत निराकरण
    👉 निलंबन की कार्रवाई

फर्जी निराकरण पर भी गिरी गाज

  • दमयंती नगर तहसील में बिना वास्तविक समाधान शिकायत बंद करने का मामला
  • आरआई और तहसीलदार को नोटिस जारी
  • जवाब के बाद आगे कार्रवाई तय होगी

प्रशासन का सख्त आदेश: स्थानीय स्तर पर ही समाधान

कलेक्टर ने सभी एसडीएम, सीएमओ और जनपद सीईओ को निर्देश दिए—

  • छोटे मामलों का निपटारा तहसील और जनपद स्तर पर ही किया जाए
  • स्थानीय स्तर पर शिविर लगाकर समाधान सुनिश्चित किया जाए
  • लोगों को जिला मुख्यालय तक आने की जरूरत न पड़े

जनता से अपील

कलेक्टर ने नागरिकों से कहा—

  • पहले शिकायत स्थानीय स्तर पर दर्ज करें
  • समाधान न मिलने पर ही जिला स्तर पर आएं
  • प्रशासन हर मामले में न्याय सुनिश्चित करेगा

प्रशासनिक संदेश स्पष्ट

इस जनसुनवाई से तीन बड़े संदेश सामने आए—
👉 आवेदक सर्वोपरि
👉 लापरवाही पर तुरंत कार्रवाई
👉 फर्जी रिपोर्टिंग पर जीरो टॉलरेंस

आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल

1. क्या बार-बार निलंबन की कार्रवाई से सिस्टम में स्थायी सुधार आ रहा है, या समस्या केवल ऊपर से नीचे दबाव में बदल रही है?

2. क्या स्थानीय स्तर पर समाधान की व्यवस्था वास्तव में मजबूत है, या लोग अभी भी जिला स्तर तक पहुंचने को मजबूर हैं?

3. क्या पोर्टल आधारित “निराकरण” प्रणाली में वास्तविक जांच के बिना फर्जी क्लोजिंग को रोकने के लिए कोई तकनीकी निगरानी तंत्र पर्याप्त रूप से मौजूद है?


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