| रीवा में 'विकास का केबल' और शहडोल में 'उपेक्षा की बेड़ियाँ': प्रभारी मंत्री के विजन पर कांग्रेस का बड़ा हमला Aajtak24 News |
शहडोल - मध्य प्रदेश की राजनीति में 'विंध्य का विकास' हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है, लेकिन अब यह मुद्दा 'क्षेत्रीय असंतुलन' की लड़ाई में तब्दील होता दिख रहा है। शहडोल संभाग, जो कि प्रदेश का एकमात्र पूर्णतः आदिवासी संभागीय मुख्यालय है, आज अपनी उपेक्षा पर आंसू बहा रहा है। इस चिंगारी को हवा दी है मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी विधि विभाग के प्रदेश उपाध्यक्ष मनीष श्रीवास्तव ने, जिन्होंने उप मुख्यमंत्री और शहडोल जिले के प्रभारी मंत्री राजेन्द्र शुक्ल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
केबल ब्रिज बनाम टूटी सड़कें: एक तुलनात्मक प्रहार
हाल ही में उप मुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने रीवा में 165 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले एक अत्याधुनिक 'हाई-टेक केबल ब्रिज' की घोषणा की। उन्होंने इसे विंध्य के गौरव और विकास का नया प्रतीक बताया। इसी बात को लेकर शहडोल में राजनीति गर्मा गई है। मनीष श्रीवास्तव ने सीधे शब्दों में पूछा कि क्या विंध्य का अर्थ केवल 'रीवा' है?
उन्होंने तंज कसते हुए कहा, "रीवा में केबल ब्रिज बनना अच्छी बात है, हम विकास के विरोधी नहीं हैं। लेकिन प्रभारी मंत्री जी, आप यह भूल रहे हैं कि शहडोल की जनता ने भी आपको जिम्मेदारी सौंपी है। रीवा के केबल ब्रिज से शहडोल के उन हजारों राहगीरों को क्या लाभ होगा, जो पिछले एक दशक से धूल और अधूरे निर्माण के बीच फँसे हुए हैं?"
शहडोल की 'ब्रिज-लेस' त्रासदी: फाइलों में दबे ओवरब्रिज
शहडोल शहर की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहाँ रेलवे लाइन शहर को दो हिस्सों में बांटती है। मनीष श्रीवास्तव ने उन महत्वपूर्ण परियोजनाओं की सूची गिनाई जो वर्षों से ठंडे बस्ते में हैं:
पुरानी बस्ती और पोंडा नाला: यहाँ एक अदद रेलवे ओवरब्रिज (ROB) के लिए जनता दशकों से मांग कर रही है। चुनाव आते हैं, वादे होते हैं, लेकिन पत्थर एक भी नहीं हिलता।
रीवा रोड बाईपास: विडंबना देखिए कि यहाँ ब्रिज का ढांचा खड़ा तो हो गया है, लेकिन तकनीकी खामियों या प्रशासनिक सुस्ती के कारण इसे जनता के लिए आज तक चालू नहीं किया जा सका।
शहडोल-उमरिया मार्ग का 'वनवास': श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि इस मार्ग पर पिछले 10 वर्षों से लगभग 5 ओवरब्रिज निर्माणाधीन हैं। एक दशक बीत जाने के बाद भी इनका काम पूरा न होना प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है।
प्रभारी मंत्री की 'संकीर्ण मानसिकता' पर सवाल
कांग्रेस नेता ने प्रभारी मंत्री राजेन्द्र शुक्ल की कार्यशैली को 'संकीर्ण मानसिकता' का परिचायक बताया। उन्होंने कहा कि एक प्रभारी मंत्री का कर्तव्य पूरे जिले के विकास की प्लानिंग करना होता है, न कि केवल अपने गृह क्षेत्र की उपलब्धियों का गुणगान करना। श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि शुक्ल जी केवल रीवा के विकास को ही पूरे विंध्य का विकास बताकर जनता को भ्रमित कर रहे हैं।
उन्होंने तीखे लहजे में कहा, "शहडोल संभाग देश का गौरव है, यहाँ की आदिवासी संस्कृति और संसाधन अद्वितीय हैं। लेकिन यहाँ के चुने हुए जनप्रतिनिधि—चाहे वो विधायक हों या सांसद—पूरी तरह अकर्मण्य और विचार शून्य हो चुके हैं। वे मंत्री जी के सामने अपनी आवाज उठाने में अक्षम हैं।"
एजेंसियों पर पकड़ और प्रशासनिक शून्यता
रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि प्रभारी मंत्री के आदेशों का पालन निर्माण एजेंसियां क्यों नहीं कर रही हैं? श्रीवास्तव ने संदेह जताया कि या तो मंत्री जी की आवाज में वो दम नहीं रहा, या फिर वे जानबूझकर शहडोल की फाइलों को नीचे दबाए हुए हैं। उन्होंने मांग की कि यदि मंत्री जी वास्तव में शहडोल का हित चाहते हैं, तो उन्हें यहाँ के स्थानीय प्रतिनिधियों को साथ लेकर एक 'विजन डॉक्यूमेंट' तैयार करना चाहिए और उसे धरातल पर उतारना चाहिए।
निष्कर्ष: जन-आक्रोश की सुगबुगाहट
शहडोल की सड़कों पर घंटों जाम में फंसने वाली जनता अब रीवा के भव्य केबल ब्रिज की खबरों को देखकर खुद को 'सौतेला' महसूस कर रही है। मनीष श्रीवास्तव का यह बयान केवल एक राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि शहडोल की उस आम जनता की आवाज है जो बुनियादी ढांचे के अभाव में जी रही है। अगर समय रहते शहडोल के इन अधूरे ओवरब्रिजों और लंबित परियोजनाओं पर काम शुरू नहीं हुआ, तो आगामी समय में यह 'क्षेत्रीय असंतुलन' सत्ता पक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। शहडोल को अब 'आश्वासन के ब्रिज' नहीं, बल्कि 'सीमेंट और कंक्रीट के मजबूत पुल' चाहिए।