रतलाम; जनसुनवाई में फाइलों का हिसाब नहीं, अफसरों की भी जवाबदेही तय Aajtak24 News

रतलाम; जनसुनवाई में फाइलों का हिसाब नहीं, अफसरों की भी जवाबदेही तय Aajtak24 News

रतलाम - जिले में मंगलवार को आयोजित जनसुनवाई इस बार सिर्फ शिकायत सुनने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह लंबित मामलों के समाधान और प्रशासनिक जवाबदेही तय करने का मंच बन गई। कलेक्टर श्रीमती मिशा सिंह ने लंबे समय से लंबित आवेदनों पर स्वयं सुनवाई करते हुए संबंधित विभाग प्रमुखों और आवेदकों को आमने-सामने बैठाकर मामलों की समीक्षा की।

20 लंबित मामलों पर सीधे सुनवाई

जनसुनवाई में कुल 20 पुराने लंबित प्रकरणों पर विस्तार से चर्चा की गई।
इन मामलों में—

  • आवेदकों की समस्याएं
  • विभागीय देरी के कारण
  • फील्ड स्तर की रिपोर्ट

को सामने रखकर मौके पर समाधान की कोशिश की गई।

कलेक्टर का सख्त रुख: अफसरों की उपस्थिति अनिवार्य

कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि—

  • पुराने लंबित मामलों में अब टालमटोल नहीं चलेगी
  • संबंधित विभाग प्रमुख की उपस्थिति में ही सुनवाई होगी
  • जवाबदेही सीधे तय की जाएगी

इस मॉडल से प्रशासनिक पारदर्शिता और तेज निर्णय प्रक्रिया पर जोर दिया गया।

दो पटवारियों पर कार्रवाई, नोटिस जारी

जनसुनवाई के दौरान प्राप्त शिकायतों पर कलेक्टर ने सख्त कदम उठाते हुए दो पटवारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए।

 1. पंचेवा (पिपलौदा) के पटवारी नारायण मोयल

इन पर आरोप लगे—

  • शासकीय कार्यों में लापरवाही
  • आवेदकों से अभद्र व्यवहार
  • गरीब नागरिकों से भेदभाव
  • धमकी देने की शिकायत
  • कार्य में रुचि नहीं लेना

 2. उसरगार (रतलाम शहर) की पटवारी संगीता वर्मा

इन पर आरोप—

  • शासकीय चरागाह भूमि पर अतिक्रमण रोकने में लापरवाही
  • अवैध निर्माण पर कार्रवाई नहीं करना
  • समय पर रिपोर्ट न देना

प्रशासन का संदेश साफ: लापरवाही पर सीधी कार्रवाई

कलेक्टर ने संकेत दिया कि—

  • फील्ड स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी
  • शासकीय भूमि और जनहित से जुड़े मामलों में देरी गंभीर अपराध मानी जाएगी
  • शिकायत मिलने पर सीधे अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी

जनसुनवाई का बदला स्वरूप

यह जनसुनवाई केवल शिकायत मंच नहीं रही, बल्कि—

  • लंबित फाइलों के निपटारे का दबाव
  • अफसरों की जवाबदेही तय करने का साधन
  • और जनता-प्रशासन के सीधे संवाद का मॉडल

बनकर सामने आई।

आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल

1. क्या पटवारियों और फील्ड स्टाफ पर कार्रवाई पर्याप्त है, या समस्या सिस्टम लेवल की निगरानी कमजोरियों में छिपी है?

2. लंबित मामलों की संख्या बताती है कि क्या नियमित मॉनिटरिंग सिस्टम काम कर रहा है, या जनसुनवाई ही अंतिम समाधान मंच बन गई है?

3. क्या इस तरह की सख्ती से प्रशासनिक व्यवहार में स्थायी सुधार आएगा, या यह केवल तात्कालिक अनुशासनात्मक प्रतिक्रिया बनकर रह जाएगा?


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