रीवा में आरटीआई और समाजसेवा की आड़ में 'वसूली' का खेल Aajtak24 News

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रीवा - सफेदपोश 'समाजसेवी' और 'आरटीआई कार्यकर्ता' का चोला ओढ़कर सरकारी विभागों में भय का माहौल पैदा करने वाले तत्वों ने इन दिनों रीवा जिले में हड़कंप मचा रखा है। भ्रष्टाचार मिटाने का दंभ भरने वाले इन चेहरों पर अब 'संगठित वसूली' और 'बौद्धिक ब्लैकमेलिंग' के गंभीर आरोप लग रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या जिला प्रशासन इन संदिग्ध चेहरों की कुंडली खंगालने का साहस दिखाएगा?

"घर के महुआ बिना न जाय..." की कहावत हुई चरितार्थ

ग्रामीण अंचलों में इन दिनों एक कहावत इन स्वयंभू समाजसेवियों पर सटीक बैठ रही है— "घर के महुआ बिना न जाय, महुआ बिनय बगरे जाय।" यह विडंबना ही है कि जिन्हें अपने गांव की बदहाल आंगनवाड़ी, पंचायत में व्याप्त बंदरबांट और सहकारिता के भ्रष्टाचार से कोई सरोकार नहीं, वे मीलों दूर जाकर सरकारी महकमों में कमियां खोज रहे हैं। स्पष्ट है कि इनका उद्देश्य जनहित नहीं, बल्कि निजी स्वार्थ और विज्ञापन की भूख मिटाना है। जो लोग अपने घर की अव्यवस्था पर मौन हैं, उनका दूर-दराज के क्षेत्रों में 'भ्रष्टाचार' खोजना केवल एक सोची-समझी साजिश और 'वसूली' का जाल बुनना प्रतीत होता है।

डिग्रियों और आय के स्रोतों पर उठ रहे गंभीर सवाल

जिले में सक्रिय ऐसे कई 'कार्यकर्ताओं' की शैक्षणिक योग्यताएं अब जनचर्चा का विषय बनी हुई हैं। आरोप हैं कि अपनी 'काल्पनिक' डिग्रियों का रौब दिखाकर ये लोग अधिकारियों पर दबाव बनाते हैं और सरकारी तंत्र को गुमराह करते हैं। पत्रकारिता और आरटीआई की शुचिता को बनाए रखने के लिए अब जनता यह मांग कर रही है:

  • क्या ये कथित समाजसेवी सार्वजनिक रूप से अपनी शैक्षणिक डिग्रियों का प्रमाण देंगे?

  • साल भर में लगाई जाने वाली दर्जनों आरटीआई और उन पर होने वाले खर्च का जरिया क्या है?

  • इनके पास मौजूद विलासिता के साधन और गाड़ी-पेट्रोल का खर्च कहाँ से आ रहा है, जबकि इनके पास आय का कोई स्पष्ट स्रोत नहीं है?

ईमानदार कार्यकर्ताओं और अधिकारियों की साख को खतरा

फर्जीवाड़े के इस खेल ने उन वास्तविक समाजसेवियों की छवि को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है, जो वास्तव में भ्रष्टाचार के विरुद्ध न्यायालयों में लड़ रहे हैं। आज स्थिति यह है कि सरकारी संपत्तियों और तालाबों के स्वरूप को नष्ट करने वाले लोग ही कार्यालयों में बैठकर अधिकारियों का 'गुणगान' कर रहे हैं और अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। यदि समय रहते इन मुखौटाधारियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों का मनोबल टूटेगा और व्यवस्था में भ्रष्टाचार की जड़ें और गहरी होंगी।

प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की उम्मीद

अब समय आ गया है कि रीवा जिला प्रशासन और कलेक्टर इन संदिग्ध तत्वों की गोपनीय सीआईडी जांच कराएं। यदि कोई ईमानदार अधिकारी इन वसूलीबाजों का शिकार हो रहा है, तो आम जनता को भी उनके समर्थन में आगे आना होगा। समाजसेवा और पत्रकारिता की पवित्रता बचाए रखने के लिए ऐसे 'वसूली नेटवर्क' का पर्दाफाश करना प्रशासन की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि रीवा वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त जिले के रूप में उभर सके।

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