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| तालपत्रों में छिपा है पूर्वजों का ज्ञान; कलेक्टर ने घर-घर जाकर देखीं दुर्लभ पांडुलिपियाँ Aajtak24 News |
गरियाबंद - हमारी सदियों पुरानी संस्कृति और विज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए गरियाबंद जिला प्रशासन ने 'ज्ञान भारतम्' पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान के तहत एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। जिले की ऐतिहासिक धरोहरों को डिजिटल दुनिया से जोड़ने और उन्हें सुरक्षित करने के लिए कलेक्टर श्री बी.एस. उइके खुद मैदानी स्तर पर सक्रिय नजर आए। उन्होंने जिले के विभिन्न गाँवों का दौरा कर सदियों पुराने तालपत्रों (ताड़ के पत्तों पर लिखे लेख) का अवलोकन किया और उनके संरक्षण के लिए आवश्यक निर्देश दिए।
कोचईमुड़ा: ज्योतिष और बीजगणित का 100 साल पुराना खजाना
कलेक्टर श्री उइके ग्राम कोचईमुड़ा पहुँचे, जहाँ 75 वर्षीय डमरूराम नागेश के पास उड़िया भाषा में लिखे दुर्लभ तालपत्रों का भंडार मिला। ये तालपत्र उनके परदादा विद्याधर मांझी द्वारा लगभग एक सदी पहले लिखे गए थे।
6 खंडों का ज्ञान: यहाँ कुल 367 पन्नों पर आधारित पांडुलिपियां मिलीं, जिनमें ज्योतिष शास्त्र, बीजगणित मंत्र, वास्तुशास्त्र, हनुमान प्रसंग और हरिश्चंद्र व्रत कथा जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं।
आज भी क्षेत्र के ग्रामीण इन अभिलेखों के आधार पर शुभ-अशुभ और अन्य धार्मिक कार्यों के लिए विचार-विमर्श करने श्री नागेश के पास पहुँचते हैं।
गोडरबाय: तालपत्रों में छिपा है चिकित्सा विज्ञान
इसके बाद कलेक्टर ग्राम गोडरबाय पहुँचे और श्री दशमुराम के पास रखे 38 पन्नों के हस्तलिखित तालपत्रों का निरीक्षण किया। उड़िया भाषा में लिखित इन तालपत्रों में प्राचीन चिकित्सा पद्धति का अद्भुत वर्णन है। इसमें सर्प, बिच्छू और कुत्ते के काटने के उपचार से लेकर श्वास, हड्डी रोग और अन्य गंभीर बीमारियों के पारंपरिक इलाज की जानकारी दी गई है। दशमुराम आज भी इसी ज्ञान के आधार पर लोगों की सेवा कर रहे हैं।
405 पांडुलिपियों की जियो-टैगिंग
कलेक्टर की उपस्थिति में कुल 405 तालपत्रों को संरक्षण की दृष्टि से जियो-टैग किया गया। इससे इन पांडुलिपियों की लोकेशन और जानकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित हो गई है। कलेक्टर ने निर्देश दिए कि इन प्राचीन धरोहरों पर शोध (Research) किया जाए ताकि पूर्वजों के विज्ञान को आधुनिक समय में समझा जा सके।
आम जनता से अपील: 'ज्ञान साझा करें, स्वामित्व आपका ही रहेगा'
कलेक्टर श्री उइके ने स्पष्ट किया कि यह सर्वेक्षण पूरी तरह स्वैच्छिक है। पांडुलिपि की जानकारी देने से उसके स्वामित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने जिले के मठ, मंदिर, पुजारियों, बैगा, चिकित्सकों और साहित्यकारों से अपील की है कि यदि उनके पास 70 वर्ष या उससे पुरानी कोई भी हस्तलिखित पांडुलिपि है, तो उसकी जानकारी प्रशासन को अवश्य दें। इस अभियान के दौरान डिप्टी कलेक्टर सुश्री नेहा भेड़िया, जनपद सीईओ श्री के.एस. नागेश सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे। प्रशासन की इस पहल से गरियाबंद की सांस्कृतिक पहचान अब वैश्विक स्तर पर सुरक्षित होने की राह पर है।
