बीजापुर; ईटपाल से उठेगा सुशासन का बिगुल: क्या इस बार सच में बदल पाएगा सिस्टम या फिर रह जाएगा सिर्फ अभियान Aajtak24 News

बीजापुर; ईटपाल से उठेगा सुशासन का बिगुल: क्या इस बार सच में बदल पाएगा सिस्टम या फिर रह जाएगा सिर्फ अभियान Aajtak24 News

बीजापुर -  जिले में प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से 06 मई से 30 मई तक “सुशासन तिहार” का आयोजन किया जाएगा। इस अभियान की शुरुआत ग्राम पंचायत ईटपाल से होगी। कलेक्टर संबित मिश्रा ने साप्ताहिक समीक्षा बैठक में अधिकारियों को सख्त निर्देश देते हुए कहा कि शिविर केवल औपचारिकता न बनें, बल्कि जमीनी स्तर पर असर दिखाएं। उन्होंने जनसमस्या निवारण शिविरों में अधिक से अधिक ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित करने और प्राप्त आवेदनों का उसी दिन पोर्टल पर पंजीयन कर त्वरित निराकरण करने के निर्देश दिए। कलेक्टर ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकतम समस्याओं का समाधान मौके पर ही किया जाए, ताकि लोगों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें।

ग्राम सभाओं में उठने वाली मांगों को प्राथमिकता देते हुए उन्हें स्वीकृति प्रदान करने और हितग्राहियों को प्रमाण पत्र मौके पर ही वितरित करने के निर्देश दिए गए। शिविरों में वनाधिकार पट्टा, आधार कार्ड, आयुष्मान कार्ड, जाति, निवास और आय प्रमाण पत्र सहित विभिन्न योजनाओं का लाभ तत्काल देने पर जोर दिया गया। बैठक में “बस्तर मुन्ने सैचुरेशन शिविर” की प्रगति की भी समीक्षा की गई और अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि वे नियमित मॉनिटरिंग कर हर पात्र व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाना सुनिश्चित करें।

इसके साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और सड़क जैसे महत्वपूर्ण विभागों के कार्यों की भी समीक्षा की गई। बैठक में जिले के वरिष्ठ अधिकारी और मैदानी अमला उपस्थित रहा। प्रशासन का दावा है कि इस अभियान के जरिए हर व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाकर सुशासन की नई मिसाल कायम की जाएगी। 

आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल

  1. पिछले अभियानों में भी “त्वरित समाधान” का दावा किया गया था, फिर भी लोगों को महीनों तक भटकना पड़ा—इस बार क्या ठोस बदलाव किए गए हैं जो इसे अलग बनाते हैं?
  2. क्या प्रशासन यह गारंटी दे सकता है कि शिविरों में दर्ज सभी आवेदनों का निपटारा तय समयसीमा में होगा, और अगर नहीं हुआ तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
  3. ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर जानकारी और पहुंच की कमी रहती है—क्या यह अभियान केवल आंकड़ों तक सीमित रहेगा या वास्तव में दूरस्थ गांवों तक प्रभावी ढंग से पहुंचेगा?

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