मप्र में अवैध नशा, ओवररेटिंग और पैकारी का जाल: क्या बेपटरी हो रही कानून व्यवस्था? Aajtak24 News

मप्र में अवैध नशा, ओवररेटिंग और पैकारी का जाल: क्या बेपटरी हो रही कानून व्यवस्था? Aajtak24 News

भोपाल - मध्य प्रदेश के अमूमन हर हिस्से से इन दिनों अवैध शराब की बिक्री, तय कीमतों से ज्यादा वसूली (ओवररेटिंग), गली-गली पैर पसारती पैकारी और प्रतिबंधित नशीली दवाओं के काले कारोबार को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीण अंचलों से लेकर महानगरों के पॉश इलाकों तक से लगातार आ रही शिकायतें अब न सिर्फ आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली बल्कि सूबे की समूची कानून व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर रही हैं। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक गूंजती यह जन-आवाज इशारा कर रही है कि नशे का यह बेलगाम प्रसार प्रदेश में पनपते सामाजिक अपराधों की सबसे बड़ी वजह बनता जा रहा है।

नियमों को ठेंगा: ढाबों और किराना दुकानों पर सज रही महफिलें

धरातल से मिल रही रिपोर्टों के मुताबिक, सूबे के कई जिलों में वैध और अधिकृत शराब दुकानों के अलावा एक समानांतर अवैध बाजार खड़ा हो चुका है। ग्रामीण इलाकों में किराना दुकानों, हाईवे के ढाबों, पान की गुमटियों और चिन्हित अवैध ठिकानों (पैकारी) पर नियमों को ताक पर रखकर खुलेआम शराब परोसी जा रही है। आरोप यह भी हैं कि स्वीकृत लायसेंस की शर्तों को दरकिनार कर तय समय से पहले दुकानें खोली जा रही हैं और देर रात तक शटर के पीछे से खरीद-बिक्री का खेल जारी रहता है। नियमों के मुताबिक हर दुकान के बाहर रेट लिस्ट (मूल्य सूची) का प्रदर्शन और परिसर में सीसीटीवी कैमरों का सुचारू संचालन अनिवार्य है, लेकिन मैदानी हकीकत इसके उलट है। उपभोक्ताओं से मनमाने दाम वसूलना (ओवररेटिंग) अब एक आम शिकायत बन चुकी है, जिस पर प्रभावी लगाम लगाने में स्थानीय अमला नाकाम साबित हो रहा है।

सिंथेटिक नशे का बढ़ता डंक: युवाओं का भविष्य दांव पर

चिंता की बात यह है कि बात अब सिर्फ देसी-विदेशी शराब तक सीमित नहीं रही। मध्य प्रदेश के छोटे कस्बों और स्कूल-कॉलेजों के आसपास प्रतिबंधित नशीली गोलियों, सीरप और अन्य सिंथेटिक ड्रग्स का एक मजबूत नेटवर्क सक्रिय हो चुका है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब नशे की उपलब्धता इतनी सुलभ और आसान हो जाती है, तो इसका सबसे पहला और घातक प्रहार युवा पीढ़ी पर होता है। आसान पहुंच के कारण कम उम्र के लड़के-लड़कियां इस दलदल में फंस रहे हैं, जिससे न केवल उनका भविष्य अंधकारमय हो रहा है बल्कि परिवारों के आर्थिक और मानसिक ताने-बाने बिखर रहे हैं।

नशे का ग्राफ और अपराधों का कनेक्शन

विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि किसी भी क्षेत्र में अपराध की बढ़ती दर का सीधा संबंध वहां नशे के बढ़ते चलन से होता है। मध्य प्रदेश में हाल के दिनों में सामने आईं चोरी, राहजनी, लूटपाट, सरेराह मारपीट और घरेलू हिंसा की घटनाओं की तह में जाने पर अक्सर नशे का एंगल सामने आता है। त्वरित और आसान नशे की लत को पूरा करने के लिए युवा अपराध की राह पकड़ रहे हैं। हालांकि, प्रशासनिक तौर पर हर आपराधिक घटना को सीधे नशे से जोड़ना जल्दबाजी हो सकता है, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अनियंत्रित नशा अपराधियों के हौसले बढ़ाने और कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाने का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है।

आबकारी और पुलिस प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवालिया निशान नियामक संस्थाओं और स्थानीय पुलिस प्रशासन पर है। जनता के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि बिना स्थानीय शह या ढुलमुल रवैये के इतना बड़ा नेटवर्क समानांतर रूप से नहीं चल सकता। आए दिन सोशल मीडिया पर ओवररेटिंग के दावों और अवैध पैकारी के वीडियो वायरल होते हैं, जिन पर होने वाली विभागीय कार्रवाई महज खानापूर्ति या औपचारिकता तक सिमट कर रह जाती है।

निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच की उठती मांग

लगातार बढ़ते इस जन-आक्रोश के बीच अब प्रदेश स्तर पर इस पूरे नेक्सस (नेटवर्क) की एक उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग तेज होने लगी है। प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि सरकार को इस मुद्दे को महज 'राजस्व घाटे या मुनाफे' के चश्मे से देखना बंद करना होगा। यदि ये शिकायतें और वायरल दावे भ्रामक हैं, तो अफवाह उड़ाने वालों पर सख्त कार्रवाई हो; और यदि इनमें रत्ती भर भी सच्चाई है, तो इस काले कारोबार के पीछे बैठे सफेदपोशों और लापरवाह अधिकारियों पर ऐसी दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए जो एक मिसाल बने। समय रहते यदि इस पर कड़ा प्रहार नहीं किया गया, तो यह स्थिति प्रदेश की शांति और सुरक्षा के लिए एक बड़ा नासूर बन जाएगी।

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