रीवा-मऊगंज में निर्देशों की उड़ीं धज्जियां, गंगेव जनपद और स्थानीय निकायों की बड़ी लापरवाही

 रीवा-मऊगंज में निर्देशों की उड़ीं धज्जियां, गंगेव जनपद और स्थानीय निकायों की बड़ी लापरवाही

​रीवा/मऊगंज - प्रदेश सरकार द्वारा जल संरक्षण और जनभागीदारी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संचालित 'गंगा दशहरा–जल गंगा संवर्धन अभियान' प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री के सख्त निर्देशों के बाद मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) द्वारा सभी स्थानीय निकायों और जनपद पंचायतों को 25 मई को जल स्रोतों की साफ-सफाई, पूजन, और जागरूकता संगोष्ठी आयोजित करने के स्पष्ट आदेश दिए गए थे। इसके बावजूद, रीवा और मऊगंज जिले के अधिकांश तहसीलों, स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों में इन आदेशों का पालन धरातल पर होता नहीं देखा गया।

​एक पंचायत तक सिमटा अभियान, दिशा-निर्देशों का अभाव

आरोप है कि गंगेव जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी सहित कई स्थानीय निकायों ने शासन के इन महत्वपूर्ण निर्देशों को गंभीरता से नहीं लिया। गंगेव जनपद क्षेत्र की दर्जनों ग्राम पंचायतों में व्यापक कार्यक्रम आयोजित कराने के बजाय इस पूरे अभियान को महज एक पंचायत तक समेट कर रख दिया गया। अधिकांश ग्राम पंचायतों को न तो समय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए और न ही आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गईं, जिसके कारण शासन की यह महत्वाकांक्षी योजना ग्रामीण क्षेत्रों में पूरी तरह बेअसर साबित हुई।

​गंदगी के अंबार में तब्दील गढ़ का ऐतिहासिक 'शास्त्री तालाब'

प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को साफ बयां करती एक तस्वीर ग्राम पंचायत गढ़ से सामने आई है। बस्ती के बीचों-बीच स्थित यह इकलौता 'शास्त्री तालाब' वर्तमान में पूरी तरह गंदगी के अंबार से पटा हुआ है। मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप जहां तालाबों और जल स्रोतों को साफ-सुथरा और सुरक्षित रखने के लिए विशेष अभियान चलाया जाना था, वहीं धरातल पर यह योजना दम तोड़ती और विलुप्त होती दिखाई दे रही है। स्थानीय छायाचित्र (फोटोग्राफ्स) गवाही दे रहे हैं कि जिम्मेदार अधिकारियों की घोर लापरवाही के कारण इस एकमात्र जल स्रोत के उद्धार के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए।

​जांच और सख्त कार्रवाई की मांग

स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में इस उदासीनता को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते जनपद और निकाय स्तर से समुचित समन्वय किया जाता, तो पूरे विकासखंड में जल संरक्षण को लेकर एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा हो सकता था। अब सवाल यह उठता है कि शासन के स्पष्ट आदेशों के बाद भी इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हुई? क्या इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में दबा दिया जाएगा? जनप्रतिनिधियों ने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।

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