रीवा में जल हाहाकार: फाइलों में बह रही विकास की गंगा, प्यास से बेहाल जनता के बीच भ्रष्टाचार का खेल Aajtak24 News

रीवा में जल हाहाकार: फाइलों में बह रही विकास की गंगा, प्यास से बेहाल जनता के बीच भ्रष्टाचार का खेल Aajtak24 News

रीवा - विंध्य का केंद्र कहा जाने वाला रीवा जिला आज पानी की एक-एक बूंद के लिए त्राहि-माम कर रहा है। शहर की गलियों से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचलों तक भू-जल स्तर 'पाताल' की ओर जा रहा है, लेकिन प्रशासन की सक्रियता केवल कागजी आंकड़ों और मीटिंगों तक सीमित है। विडंबना यह है कि हर साल जल संरक्षण के नाम पर करोड़ों का बजट 'सोख' लिया जाता है, पर धरातल पर जनता की प्यास बुझाने के बजाय समस्याओं को उलझाने का खेल जारी है।

महामारी को न्योता: मौत परोस रही हैं गंदगी से भरी टंकियां

जन स्वास्थ्य के साथ हो रहा खिलवाड़ अब सीमा पार कर चुका है। जिले के कई क्षेत्रों में पानी की टंकियों की सालों से सफाई नहीं हुई है। इन टंकियों में पक्षियों के कंकाल और गंदगी जमा है। पंचायत और पीएचई (PHE) विभाग की यह घोर लापरवाही सीधे तौर पर महामारी को आमंत्रण दे रही है। 'नल-जल योजना' के तहत साफ पानी देने के दावे यहाँ पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं।

जल जीवन मिशन: 'कमीशन' के भेंट चढ़ी योजना

जल जीवन मिशन, जिसे जनता की प्यास बुझाने के लिए लाया गया था, वह अब भ्रष्टाचार का केंद्र बनता जा रहा है। आरोप है कि:

  • ठेकेदार बिना काम पूरा किए ही पंचायतों को प्रभार सौंप रहे हैं।

  • घटिया निर्माण और गुणवत्ताहीन पाइपलाइन बिछाकर कागजों पर खानापूर्ति की जा रही है।

  • सरपंचों और विभागीय अधिकारियों के बीच 'सेवा शुल्क' (कमीशन) के खेल के कारण जनता के हिस्से का पानी भ्रष्टाचार की नाली में बह रहा है।

बिजली बिल का 'अंधेरा' और प्यासे ग्रामीण

ग्रामीण अंचलों में पानी की किल्लत का एक बड़ा तकनीकी कारण बिजली बिलों का बकाया होना है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पंचायतों के पास अन्य फिजूलखर्ची के लिए बजट उपलब्ध है, लेकिन मोटर चलाने के लिए बिजली बिल जमा करने में उनकी कोई रुचि नहीं है। जानकारों का कहना है कि चूँकि बिजली बिल भुगतान में किसी प्रकार की 'कमीशन राशि' नहीं मिलती, इसलिए पंचायतें इसे प्राथमिकता नहीं देतीं। इसका खामियाजा भीषण गर्मी में जनता को भुगतना पड़ रहा है।

अस्तित्व खोते प्राकृतिक स्रोत और प्रशासन की मौन सहमति

रीवा के पारंपरिक जल स्रोत जैसे डैम, तालाब और कुएं अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होते जा रहे हैं। भू-जल स्तर गिरने के कारण हैंडपंपों ने दम तोड़ दिया है, विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में स्थिति भयावह है। जल स्रोतों के अतिक्रमण और उनके सूखने के पीछे न तो राजस्व विभाग गंभीर दिख रहा है और न ही जिला प्रशासन।

सत्ता की उदासीनता: समाधान या सिर्फ बजट की बंदरबांट?

आज रीवा की जनता यह सवाल पूछ रही है कि क्या उनके जनप्रतिनिधि वास्तव में इस संकट का समाधान चाहते हैं? हर साल स्थिति सुधरने के बजाय और अधिक विकराल होती जा रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि समस्याओं का स्थायी निराकरण करने के बजाय उन्हें जानबूझकर उलझाए रखा जा रहा है, ताकि प्रतिवर्ष 'आपातकालीन बजट' के नाम पर सरकारी धन की बंदरबांट का सिलसिला जारी रहे। रीवा का जल संकट अब केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक बड़ी 'प्रशासनिक विफलता' बन चुका है। यदि समय रहते पुराने तालाबों का पुनरुद्धार नहीं किया गया और 'कमीशनखोरी' पर लगाम नहीं कसी गई, तो भविष्य में पानी के लिए होने वाले गृह-युद्ध को टालना नामुमकिन होगा। प्रशासन को अब फाइलों के ढेर से बाहर निकलकर प्यासी जनता की सुध लेनी ही होगी।

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