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| रीवा-मऊगंज में भू-माफियाओं का 'सफेदपोश' तिलिस्म; क्या प्रशासन दिखाएगा फाइलें खोलने का दम? Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - विंध्य की धरा पर इन दिनों विकास की चर्चाओं से कहीं अधिक 'विनाशकारी भ्रष्टाचार' की गूँज सुनाई दे रही है। सवाल सीधा और तीखा है—क्या रीवा और नवगठित मऊगंज जिले में पिछले दो दशकों से फल-फूल रहे 'भू-माफिया राज' पर वर्तमान प्रशासन का हंटर चलेगा? रसूखदारों के संरक्षण में सरकारी जमीनों की जिस तरह 'अंतेष्टि' की गई है, उसने न केवल राजस्व को चूना लगाया है, बल्कि जिले के भविष्य को भी दांव पर लगा दिया है।
2004 के बाद 'बंदरबांट' का खूनी खेल
आंकड़े और स्थानीय आरोप गवाही दे रहे हैं कि वर्ष 1947 से 2004 तक जो सरकारी जमीनें सुरक्षित थीं, वे अचानक 2004 के बाद 'जादुई' तरीके से निजी तिजोरियों में तब्दील होने लगीं। रीवा के 'हृदय स्थल' से लेकर बस स्टैंड तक की बेशकीमती जमीनों का निजीकरण इस खेल की सबसे बड़ी बानगी है। आज विडंबना यह है कि नए सरकारी दफ्तरों के निर्माण के लिए प्रशासन के पास स्वयं की भूमि शेष नहीं बची है।
शातिर मॉडल: पिता का नाम बदला, बदल गई जमीन की किस्मत!
भ्रष्टाचार का यह मॉडल इतना शातिर है कि बेनामी संपत्तियों को डमी नामों या 'काल्पनिक पिताओं' के नाम पर दर्ज कर दिया गया है। जांच के घेरे में कई बिंदु हैं:
डिजिटल रिकॉर्ड से छेड़छाड़: शहर के बीचों-बीच स्थित कई आलीशान मकानों और प्लॉटों का डिजिटल रिकॉर्ड जानबूझकर अधूरा या त्रुटिपूर्ण रखा गया है ताकि असली मालिकों की पहचान छिपी रहे।
प्रशासनिक जुगलबंदी: जनचर्चा है कि तत्कालीन कुछ कलेक्टरों और नगर निगम के आला अफसरों ने 'फाइलों के पहिए' घुमाने के बदले अपना हिस्सा सुरक्षित किया, जिससे रसूखदारों का 'अघोषित साम्राज्य' खड़ा हो गया।
ग्रामीण अंचल: पंचायत और थानों की जमीन पर भी 'गिद्ध दृष्टि'
यह भूमि घोटाला केवल शहरी सीमा तक सीमित नहीं रहा। मनगवां, गढ़ और रायपुर कर्चुलियान जैसे क्षेत्रों में भी सार्वजनिक जमीनों को नहीं बख्शा गया।
रक्सा माजन ग्राम पंचायत का खेल: सबसे गंभीर मामला रक्सा माजन ग्राम पंचायत का सामने आ रहा है। आरोप है कि राजस्व रिकॉर्ड में हेराफेरी कर यहाँ की बेशकीमती जमीनों को रसूखदारों के नाम चढ़ा दिया गया।
गढ़पुराना थाना की जमीन पर कब्जा: हद तो तब हो गई जब गढ़पुराना थाना की सरकारी जमीन को भी भू-माफियाओं ने अपने जाल में फंसा लिया। प्रशासनिक मिलीभगत से थाने के सुरक्षित रिकॉर्ड के साथ बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ के आरोप लग रहे हैं।
"विपक्ष की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और मुख्य विपक्ष, दोनों पर ही इस 'मलाईदार बंदरबांट' में मूक दर्शक बने रहने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।"
वर्तमान प्रशासन के सामने 'अग्निपरीक्षा'
अब गेंद वर्तमान जिला कलेक्टर और मऊगंज प्रशासन के पाले में है। जनता के बीच कुछ बुनियादी सवाल तैर रहे हैं, जिनका उत्तर भविष्य तय करेगा:
न्यायिक जांच: क्या 2004 से 2025 के बीच हुए संदिग्ध भूमि आवंटन की उच्च स्तरीय जांच होगी?
अभिलेखों का मिलान: क्या प्रशासन साहस दिखाकर इन संपत्तियों के पुराने और नए रिकॉर्ड का मिलान कर 'असली चेहरों' को बेनकाब करेगा?
बुलडोजर की दिशा: क्या कार्रवाई केवल छोटे अतिक्रमणकारियों पर सीमित रहेगी या रक्सा माजन और गढ़पुराना जैसी जमीनों को भी माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराया जाएगा?
रीवा और मऊगंज की जनता अब केवल 'प्रेस नोट' से संतुष्ट होने वाली नहीं है। सुशासन का असली पैमाना यह होगा कि क्या प्रशासन इस सत्ता-विपक्ष के तथाकथित 'अपवित्र गठबंधन' को तोड़ पाता है। अगर फाइलें नहीं खुलीं, तो आने वाली पीढ़ियां इसे विंध्य के इतिहास की 'सबसे बड़ी भूमि डकैती' के रूप में याद रखेंगी।
