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| रीवा में भ्रष्टाचार बना 'शिष्टाचार', क्या नए कलेक्टर तोड़ पाएंगे रसूखदारों का अभेद्य किला? Aajtak24 News |
रीवा - सफेद शेरों की यह धरती आज विकास की दहाड़ नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की कराह सुन रही है। रीवा और नवनिर्मित मऊगंज जिले की जनता आज एक ऐसे मुहाने पर खड़ी है, जहां व्यवस्था के प्रति उपजे गहरे असंतोष के बीच उनकी उम्मीदें केवल नए जिला कलेक्टर की ओर टिकी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या कलेक्टर महोदय उस तंत्र को हिला पाएंगे जहां भ्रष्टाचार अब 'शिष्टाचार' का रूप ले चुका है?
1. सरकारी तंत्र में 'दीमक' की तरह फैला भ्रष्टाचार
रीवा की प्रशासनिक मशीनरी इस समय गंभीर चुनौतियों से घिरी है। सहकारिता और खाद्य विभाग में ठेकेदारों और कर्मचारियों की ऐसी मिलीभगत है कि सहकारी संस्थाएं दिवालिया होने की कगार पर हैं। मऊगंज और रीवा के राजस्व मामलों में निजी स्वार्थ की पूर्ति शासन की नीतियों पर भारी पड़ रही है, जिससे सरकारी खजाने को करोड़ों की चपत लग रही है।
2. मासूमों के निवाले पर रसूखदारों का 'कब्जा'
महिला एवं बाल विकास विभाग में भ्रष्टाचार का खेल सबसे वीभत्स है। आंगनबाड़ियों में मासूम बच्चों, किशोरी बालिकाओं और धात्री महिलाओं के लिए आने वाला पोषण आहार 'काल्पनिक वितरण' की भेंट चढ़ रहा है।
आरोप: 90% भोजन वितरण समूहों पर सत्ताधारी दल से जुड़े रसूखदारों का कब्जा है।
हकीकत: अभिलेखों में सबके पेट भरे जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर थाली खाली है।
3. बेहाल स्वास्थ्य, उजाड़ वन और माफियाराज
रीवा की भौगोलिक संपदा को खनिज माफियाओं ने खोखला कर दिया है। वन विभाग की स्थिति यह है कि कागजों पर तो हजारों पेड़ 'लगे' हैं, लेकिन जमीन पर उनका वजूद ढूंढना नामुमकिन है। वहीं स्वास्थ्य विभाग का आलम यह है कि गांवों में सरकारी डॉक्टर नदारद हैं और जनता 'झोलाछाप' चिकित्सकों के भरोसे जीने को मजबूर है।
4. राजस्व का 'गायब' होता नक्शा और शिक्षा की बदहाली
राजस्व विभाग की घोर लापरवाही का आलम यह है कि नेशनल हाईवे (NH 30 और 135) के आसपास की बेशकीमती शासकीय भूमि अब सरकारी नक्शों और खसरों से विलुप्त होती जा रही है। शिक्षा विभाग में विरोधाभास देखिए—जहां एक ओर शिक्षा का 'महानगरीय मॉडल' पेश किया जा रहा है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षक आज भी मात्र ₹1500 के मानदेय पर भविष्य गढ़ने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।
5. सत्ता का संरक्षण: कलेक्टर की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा
नए कलेक्टर के सामने सबसे बड़ी बाधा वे 'अजेय' कर्मचारी हैं जिन्होंने जनप्रतिनिधियों की ओट में अपना सुरक्षित किला बना लिया है। सत्ता के गलियारों में पकड़ रखने वाले ये कर्मचारी किसी भी प्रशासनिक चाबुक को बेअसर करने की क्षमता रखते हैं।
संपादकीय दृष्टिकोण: साहस या समझौता?
क्या नए कलेक्टर इस मकड़जाल को तोड़ने का साहस दिखा पाएंगे? क्या रसूखदारों के गठजोड़ पर कानून का डंडा चलेगा? रीवा की दुर्दशा और सरकार की धूमिल होती छवि को बचाना अब पूरी तरह कलेक्टर की कार्यशैली पर निर्भर है। यह उनके लिए केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि जनता के टूटे हुए विश्वास को फिर से जोड़ने की एक कठिन 'अग्निपरीक्षा' है।
