बस्तर; जहां कभी गोलियों की गूंज थी, वहां अब समाधान शिविर: भेजा में विकास ने बदली तस्वीर Aajtak24 News

बस्तर; जहां कभी गोलियों की गूंज थी, वहां अब समाधान शिविर: भेजा में विकास ने बदली तस्वीर Aajtak24 News

जगदलपुर - बस्तर के सुदूर वनांचल में स्थित भेजा गांव, जो कभी माओवादी प्रभाव और भय की पहचान माना जाता था, अब बदलाव और विकास की नई कहानी लिखता नजर आ रहा है। शासन को गांव तक पहुंचाने और लोगों की समस्याओं का मौके पर समाधान देने के उद्देश्य से आयोजित सुशासन तिहार जनसमस्या निवारण शिविर में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए और योजनाओं का सीधा लाभ प्राप्त किया। लोहंडीगुड़ा विकासखंड के इस शिविर में विभिन्न विभागों से जुड़े 260 आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 130 मामलों का मौके पर निराकरण किया गया। शेष मामलों को प्राथमिकता के आधार पर संबंधित विभागों को भेजा गया। प्रशासन का दावा है कि क्षेत्र अब शांति और विकास की मुख्यधारा में आगे बढ़ रहा है।

शिविर के दौरान स्वास्थ्य विभाग ने पोर्टेबल एक्स-रे मशीन से ग्रामीणों की जांच कर संभावित टीबी मरीजों की पहचान की। साथ ही पात्र हितग्राहियों को आयुष्मान कार्ड उपलब्ध कराए गए। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास हितग्राहियों को घरों की चाबियां सौंपी गईं, जबकि महिला स्व-सहायता समूहों और लखपति दीदियों को प्रमाण पत्र और आर्थिक सहायता दी गई।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड, मत्स्य हितग्राहियों को मछली जाल वितरित किए गए। शिक्षा क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया और स्कूली बच्चों को जाति प्रमाण पत्र भी दिए गए। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत बुजुर्गों को पेंशन स्वीकृति प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। यह शिविर केवल योजनाओं के वितरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासन ने इसे गांवों में भरोसा और सरकारी पहुंच मजबूत करने की पहल के रूप में प्रस्तुत किया।

आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल

1. मौके पर जिन 130 आवेदनों का निराकरण हुआ, उनकी गुणवत्ता और वास्तविक लाभ का सत्यापन किस स्तर पर किया जाएगा?

2. जिन क्षेत्रों को माओवादी प्रभाव से मुक्त बताया जा रहा है, वहां शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के दीर्घकालिक आंकड़े सार्वजनिक किए जाएंगे?

3. शिविर आधारित समाधान के बाद क्या प्रशासन स्थायी सेवा तंत्र विकसित करेगा या ग्रामीणों को फिर से दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे?

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