| जंगल, नदी और मौत से जंग… सुकमा के स्वास्थ्य दूतों ने बचाई दो मासूमों की जिंदगी Aajtak24 News |
सुकमा - बस्तर के घने जंगलों, उफनते नदी-नालों और दुर्गम रास्तों के बीच सुकमा जिले से इंसानियत और प्रशासनिक संवेदनशीलता की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने सरकारी तंत्र की जमीनी तस्वीर को नई पहचान दी है। “मुख्यमंत्री स्वस्थ बस्तर अभियान” के तहत स्वास्थ्य विभाग की टीम ने दुर्गम ग्राम दुरभा पहुंचकर दो गंभीर रूप से बीमार मासूम बच्चियों की जान बचाई। 5 वर्षीय माड़वी नन्दे और 4 वर्षीय माड़वी सुमड़ी मलेरिया, गंभीर कुपोषण और अत्यधिक खून की कमी से जूझ रही थीं। दोनों बच्चियों के शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर केवल 2 से 3 ग्राम तक रह गया था, जो किसी भी समय जानलेवा साबित हो सकता था। गांव तक सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की सीधी पहुंच नहीं होने के बावजूद स्वास्थ्य टीम ने हार नहीं मानी।
कलेक्टर अमित कुमार के मार्गदर्शन में स्वास्थ्य कर्मियों ने जंगलों और नदी-नालों को पार करते हुए दुरभा गांव तक पहुंच बनाई। बच्चियों की हालत देखकर टीम ने तत्काल उन्हें अस्पताल पहुंचाने का फैसला किया। दुर्गम रास्तों में कई किलोमीटर तक पैदल सफर कर दोनों बच्चियों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक लाया गया, जहां से एम्बुलेंस के जरिए करीब 96 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल सुकमा भेजा गया। जिला अस्पताल में डॉक्टरों ने युद्धस्तर पर इलाज शुरू किया। बच्चियों को खून चढ़ाया गया, मलेरिया का पूरा उपचार दिया गया और पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में विशेष देखभाल की गई। लगातार निगरानी और उपचार के बाद कुछ ही दिनों में दोनों बच्चियों का हीमोग्लोबिन स्तर 9 ग्राम से ऊपर पहुंच गया और उनकी हालत में तेजी से सुधार हुआ।
स्वास्थ्य विभाग ने केवल इलाज तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि बच्चियों के परिजनों को पोषण, स्वच्छता और बच्चों के मानसिक विकास को लेकर भी परामर्श दिया गया। प्रशासन की ओर से आवश्यक दस्तावेज तैयार कर दोनों बच्चियों को शासन की अन्य कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने की प्रक्रिया भी शुरू की गई। इलाज के बाद दोनों बच्चियों को सुरक्षित उनके गांव वापस पहुंचाया गया। गांव लौटने के बाद मासूमों की मुस्कान अब उस अभियान की सफलता की गवाही बन चुकी है, जो बस्तर के अंतिम छोर तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का दावा कर रहा है।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार “मुख्यमंत्री स्वस्थ बस्तर अभियान” के तहत सुकमा जिले में अब तक 1 लाख 74 हजार 770 लोगों की स्वास्थ्य जांच और उपचार किया जा चुका है। अभियान के दौरान 5 हजार 240 से अधिक मरीजों को मलेरिया, टीबी, कुपोषण, एनीमिया, हाई रिस्क प्रेग्नेंसी, बीपी और शुगर जैसी बीमारियों के आधार पर चिन्हित कर बेहतर उपचार के लिए रेफर किया गया है। हालांकि यह सफलता प्रशासन के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, लेकिन यह सवाल भी खड़ा करती है कि आखिर आज भी बस्तर के कई गांवों में बच्चे इतनी गंभीर स्थिति तक पहुंच क्यों जाते हैं, जहां जीवन बचाने के लिए स्वास्थ्य टीमों को मौत से मुकाबला करना पड़ता है।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- जब दोनों बच्चियां गंभीर कुपोषण और मलेरिया से इतनी खराब स्थिति में पहुंच गई थीं, तो क्या स्थानीय स्वास्थ्य तंत्र पहले से उनकी निगरानी करने में विफल रहा?
- मुख्यमंत्री स्वस्थ बस्तर अभियान के बावजूद आज भी कई गांव सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं से कटे हुए हैं, ऐसे में आपात स्थिति में समय पर इलाज कैसे सुनिश्चित होगा?
- जिले में अब तक 5 हजार से अधिक गंभीर मरीज चिन्हित हुए हैं, तो क्या प्रशासन के पास इन मरीजों की दीर्घकालिक निगरानी और फॉलोअप की ठोस व्यवस्था है?