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| बैतूल जनसुनवाई में कड़ा रुख: पेयजल से लेकर अतिक्रमण तक पर कलेक्टर सख्त Aajtak24 News |
बैतूल - बैतूल में मंगलवार को आयोजित जनसुनवाई में कलेक्टर डॉ. सौरभ संजय सोनवणे ने नागरिकों की समस्याओं को गंभीरता से सुनते हुए कई मामलों में तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। कलेक्ट्रेट सभाकक्ष में सुबह 11 बजे से हुई इस जनसुनवाई में राजस्व, भूमि विवाद, पेंशन, कृषि और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े दर्जनों आवेदन सामने आए। कलेक्टर ने कई मामलों का मौके पर ही समाधान कराया, जबकि शेष प्रकरणों के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय कर अधिकारियों को जल्द निराकरण के निर्देश दिए।
पेयजल संकट पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश
चिचोली विकासखंड के ग्राम टाढर निवासी हीरालाल ने पेयजल समस्या की शिकायत की। इस पर कलेक्टर ने पीएचई विभाग को तुरंत समस्या का समाधान करने के निर्देश दिए।
उन्होंने अधिकारियों को साफ कहा कि:
- जनसुनवाई में आए मामलों को दोबारा न आने दिया जाए
- हर शिकायत का समयबद्ध और स्थायी समाधान किया जाए
- लापरवाही बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी
सीमांकन, बिजली और सिंचाई विवाद पर भी निर्देश
जनसुनवाई में कई महत्वपूर्ण मामलों पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए:
- सीमांकन और कब्जा दिलाने के लिए तहसीलदार को आदेश
- बिजली कनेक्शन संबंधी शिकायत पर एमपीईबी को निर्देश
- नहर मरम्मत और पानी विवाद पर जल संसाधन विभाग को कार्रवाई के आदेश
अतिक्रमण और रास्ता विवाद पर सख्ती
कई ग्रामीणों ने रास्तों और खेतों पर अतिक्रमण की शिकायत की, जिन पर कलेक्टर ने तत्काल संज्ञान लिया:
- शाहपुर में अवैध कब्जा हटाने के निर्देश
- आठनेर और मुलताई में खेत के रास्तों का समाधान करने के आदेश
- पीएम योजना के तहत निर्माण से बाधित रास्ते की जांच के निर्देश
प्रशासन का स्पष्ट संदेश: “शिकायत नहीं, समाधान चाहिए”
कलेक्टर ने कहा कि जनसुनवाई का उद्देश्य केवल आवेदन लेना नहीं, बल्कि वास्तविक समाधान देना है। उन्होंने सभी विभागीय अधिकारियों को निर्देशित किया कि किसी भी प्रकरण को लंबित न रखा जाए।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- अगर हर जनसुनवाई में पेयजल, अतिक्रमण और सीमांकन जैसे मामलों पर तत्काल निर्देश देने पड़ते हैं, तो क्या यह स्थायी समाधान प्रणाली की कमी को नहीं दिखाता?
- क्या जनसुनवाई में आने वाले ज्यादातर मामले पहले से ही विभागीय स्तर पर निपटाए जा सकते थे, लेकिन देरी के कारण कलेक्टर स्तर तक पहुंचते हैं?
- “लापरवाही बर्दाश्त नहीं” जैसे निर्देश हर जिले में बार-बार क्यों दोहराए जाते हैं—क्या इसके बावजूद वास्तविक जवाबदेही तय हो पाती है?
