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| गुना; 288 फरियादी पहुंचे कलेक्ट्रेट! इलाज, पेंशन और बिजली संकट ने खोली सिस्टम की पोल Aajtak24 News |
गुना - किशोर कुमार कन्याल की अध्यक्षता में मंगलवार को जिला कलेक्ट्रेट में आयोजित जनसुनवाई में आमजन की समस्याओं का बड़ा अंबार देखने को मिला। जनसुनवाई में जिलेभर से आए नागरिकों ने सीमांकन, बिजली, पेंशन, नामांतरण, स्वास्थ्य और नगरपालिका से जुड़ी समस्याएं प्रशासन के सामने रखीं। इस दौरान कुल 288 आवेदन प्रस्तुत किए गए। कलेक्टर ने एक-एक आवेदक की समस्या को गंभीरता से सुनते हुए संबंधित विभागों के अधिकारियों को त्वरित और गुणवत्तापूर्ण निराकरण के निर्देश दिए। कई मामलों में अधिकारियों को मौके पर ही कार्रवाई के आदेश दिए गए, जबकि लंबित प्रकरणों के लिए समय-सीमा तय की गई।
जनसुनवाई के दौरान राघौगढ़ क्षेत्र के ग्राम गोविंदपुरा निवासी हेमलता जाटव का मामला विशेष रूप से सामने आया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 से लगातार गंभीर बीमारी का उपचार चल रहा है। जिला चिकित्सालय से लेकर निजी अस्पतालों तक इलाज कराने के बाद उन्हें भोपाल स्थित एम्स रेफर किया गया, लेकिन आयुष्मान कार्ड का लाभ मिलने के बावजूद दवाइयों और इलाज पर 60 हजार रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं। आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवार की स्थिति को देखते हुए कलेक्टर ने तत्काल रेडक्रॉस सोसाइटी के माध्यम से 10 हजार रुपये की सहायता राशि स्वीकृत की।
जनसुनवाई में प्रशासन द्वारा स्वास्थ्य और अन्य जनसेवाओं को भी जोड़ा गया। स्वास्थ्य विभाग की ओर से 70 प्लस आयुष्मान कार्ड, नेत्र परीक्षण, एचआईवी जांच और निशुल्क कानूनी सहायता जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं, जिनका बड़ी संख्या में लोगों ने लाभ लिया। साथ ही आधार कार्ड संबंधी सेवाएं भी प्रदान की गईं। हालांकि बड़ी संख्या में आए आवेदनों ने एक बार फिर निचले स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिजली, पेंशन और नामांतरण जैसी मूलभूत समस्याओं के लिए लोगों को जिला मुख्यालय तक पहुंचना पड़ रहा है, जिससे विभागीय कार्यप्रणाली की सुस्ती उजागर हो रही है। इस दौरान अखिलेश जैन, शिवानी पाण्डेय सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- जब पेंशन, बिजली और नामांतरण जैसी बुनियादी समस्याएं लगातार जनसुनवाई में आ रही हैं, तो संबंधित विभाग नियमित स्तर पर समाधान क्यों नहीं कर पा रहे?
- आयुष्मान योजना के बावजूद मरीजों को इलाज में हजारों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं, क्या सरकार की स्वास्थ्य योजनाएं जमीनी स्तर पर पूरी तरह प्रभावी नहीं हैं?
- क्या प्रशासन यह बताएगा कि पिछली जनसुनवाईयों में प्राप्त कितने आवेदन आज भी लंबित हैं और किन अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है?
