| बिलासपुर; जनदर्शन में 103 आवाज़ें: घोटाले से लेकर पानी तक—क्या सिस्टम जागा या फिर सिर्फ आश्वासन मिला? Aajtak24 News |
बिलासपुर - जिले में आयोजित साप्ताहिक जनदर्शन में इस बार समस्याओं का अंबार देखने को मिला, जहां 103 आवेदनों पर सुनवाई की गई। कलेक्टर संजय अग्रवाल ने खुद आवेदकों से संवाद कर उनकी समस्याएं सुनीं और संबंधित अधिकारियों को समयबद्ध निराकरण के निर्देश दिए। इस दौरान नगर निगम आयुक्त प्रकाश सर्वे और जिला पंचायत सीईओ संदीप अग्रवाल भी मौजूद रहे। जनदर्शन में राजस्व, आवास, पेयजल, अतिक्रमण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मामलों की भरमार रही। कई मामलों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी खड़े किए।
सबसे गंभीर मामला पचपेड़ी तहसील के बिनौरी गांव से सामने आया, जहां बुजुर्ग तुलसीराम कुर्रे ने प्रधानमंत्री आवास योजना की राशि में गड़बड़ी का आरोप लगाया। उनका कहना है कि उनके नाम स्वीकृत राशि किसी और के खाते में ट्रांसफर कर दी गई। इस पर कलेक्टर ने जांच कर राशि वापस दिलाने और दोषियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए। वहीं बेलतरा के बैमा गांव में श्मशान भूमि से अतिक्रमण हटाने के आदेश के बावजूद कार्रवाई न होने की शिकायत सामने आई। तखतपुर क्षेत्र से शौचालय निर्माण सहायता और मजदूरी भुगतान लंबित होने के मामले भी आए।
मोछ गांव के ग्रामीणों ने अवैध खनन का मुद्दा उठाते हुए तालाब में मशीनों से खुदाई कर मुरूम चोरी की शिकायत की, जिस पर खनिज विभाग को जांच के निर्देश दिए गए। रतनपुर के पोंड़ गांव में तालाब को निजी नाम पर दर्ज कर उसे पाटने की शिकायत ने भी प्रशासन को सतर्क किया। इसके अलावा पेयजल संकट भी प्रमुख मुद्दा रहा। गोढ़ी गांव में जलस्तर अत्यधिक नीचे जाने और जल जीवन मिशन की टंकी बंद होने की बात सामने आई, जिस पर त्वरित सुधार के निर्देश दिए गए। कलेक्टर ने स्पष्ट कहा कि सभी मामलों का प्राथमिकता के साथ निराकरण किया जाए, ताकि आम लोगों को जल्द राहत मिल सके। हालांकि अब यह देखना अहम होगा कि इन निर्देशों का असर जमीन पर कितनी तेजी से दिखाई देता है।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- प्रधानमंत्री आवास योजना में राशि गबन जैसे गंभीर मामले सामने आए हैं—क्या प्रशासन जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की समयसीमा तय करेगा?
- 103 आवेदनों में बड़ी संख्या बुनियादी समस्याओं की है—क्या यह प्रशासनिक तंत्र की विफलता को नहीं दर्शाता?
- अतिक्रमण और अवैध खनन जैसे मामलों में बार-बार शिकायतों के बावजूद स्थायी समाधान क्यों नहीं हो पा रहा, और इसके लिए जवाबदेही किसकी तय होगी?