शहडोल; करोड़ों का 'सफेद हाथी': ₹10 करोड़ की भव्य बिल्डिंग में वेंटिलेटर पर स्वास्थ्य सेवाएं, गरीबों को इलाज नहीं Aajtak24 News

शहडोल; करोड़ों का 'सफेद हाथी': ₹10 करोड़ की भव्य बिल्डिंग में वेंटिलेटर पर स्वास्थ्य सेवाएं, गरीबों को इलाज नहीं Aajtak24 News

शहडोल/जयसिंहनगर - आदिवासी बाहुल्य जयसिंहनगर क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, लेकिन नतीजा सिफर रहा। यहाँ ₹10 करोड़ की भारी-भरकम लागत से तैयार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) का आलीशान भवन आज आम जनता के लिए किसी 'सफेद हाथी' से कम नहीं रह गया है। ऊंची इमारतें तो खड़ी कर दी गईं, लेकिन उनके भीतर न तो डॉक्टरों की संवेदना बची है और न ही बुनियादी सुविधाएं।

मैदान से गायब 'कप्तान', राम भरोसे अस्पताल

अस्पताल की इस बदहाली की सबसे बड़ी वजह प्रशासनिक लापरवाही है। खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) ने नियमों को ताक पर रखकर जयसिंहनगर के बजाय शहडोल मुख्यालय में अपना बसेरा बना लिया है। जब जिम्मेदार अधिकारी ही मुख्यालय से नदारद हो, तो मातहतों की मनमानी सातवें आसमान पर है। नतीजा यह है कि पूरा अस्पताल सिस्टम 'राम भरोसे' चल रहा है।

कागजों पर डॉक्टरों की फौज, हकीकत में सन्नाटा

अभिलेखों में यहाँ 6 डॉक्टरों की तैनाती है, लेकिन अस्पताल परिसर में सन्नाटा पसरा रहता है। ड्यूटी के समय डॉक्टर या तो अपने सरकारी आवासों में विश्राम करते हैं या फिर निजी प्रैक्टिस में मशगूल रहते हैं। इमरजेंसी की स्थिति में मरीजों को वार्ड बॉय तक नसीब नहीं होता।

खौफनाक दास्तां: खुसरवाह निवासी बेनीमाधव चतुर्वेदी जब अपनी नातिन को प्रसव के लिए रात 10 बजे अस्पताल लेकर पहुँचे, तो वहां सन्नाटा था। न डॉक्टर मिले न नर्स। मजबूरन उस नाजुक हालत में उन्हें मरीज को लेकर शहडोल भागना पड़ा।

दंत चिकित्सा के नाम पर लूट और कमीशन का खेल

अस्पताल में दो दंत चिकित्सक तैनात हैं, जिनका मोटा वेतन नियमित रूप से निकल रहा है। लेकिन मरीजों को "मशीन खराब है" का बहाना बनाकर निजी क्लीनिकों की ओर धकेल दिया जाता है। यह स्पष्ट रूप से एक संगठित कमीशनखोरी की ओर इशारा करता है, जहाँ सरकारी संस्थान को केवल निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

पट्टी-मल्हम तक गायब, बाजार के भरोसे गरीब

हैरानी की बात यह है कि ₹10 करोड़ के इस भव्य परिसर में पट्टी, रुई और मल्हम जैसी साधारण चीजें भी उपलब्ध नहीं हैं। गंभीर मरीजों के परिजनों को छोटी-छोटी चीजों के लिए बाहर की दुकानों पर भेजा जाता है। "निःशुल्क उपचार" का सरकारी नारा यहाँ महज़ मज़ाक बनकर रह गया है।

अव्यवस्थाओं की पराकाष्ठा: प्यास, गंदगी और तपते वार्ड

  • डॉक्टरों के लिए AC, मरीजों के लिए लू: भीषण गर्मी में मरीज बिना पंखे और कूलर के तड़प रहे हैं, जबकि डॉक्टरों के चेंबरों में कूलर पूरी रफ्तार से चल रहे हैं।

  • न पानी, न शौचालय: परिसर में पीने के पानी की बूंद-बूंद के लिए तीमारदार भटक रहे हैं। शौचालयों की स्थिति इतनी नारकीय है कि वहां कदम रखना भी मुमकिन नहीं है।

नेताओं की चुप्पी और 'रेफरल' का धंधा

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और विधायक की 'रहस्यमयी चुप्पी' पर भी सवाल उठ रहे हैं। चुनाव में बड़े वादे करने वाले नेता आज इन आदिवासियों के आंसू पोंछने नहीं आ रहे हैं। अस्पताल अब इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि 'रेफरल सेंटर' बन गया है, जहाँ से मरीजों को निजी एम्बुलेंसों के जरिए निजी अस्पतालों के हवाले कर दिया जाता है।

प्रशासन को खुली चुनौती:

इस पूरे मामले पर जब BMO से संपर्क की कोशिश की गई, तो उन्होंने फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा। यह चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि इन अव्यवस्थाओं को उच्चाधिकारियों का मौन संरक्षण प्राप्त है। क्षेत्र की जनता अब पूछ रही है कि क्या उनकी जान की कोई कीमत नहीं है?

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