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| विंध्य में 'सफेदपोश' मेडिकल माफिया का तांडव: रीवा और मऊगंज में सेवा के नाम पर वसूली का 'अरबपति' साम्राज्य! Aajtak24 News |
रीवा - विंध्य की धरा पर इन दिनों एक ऐसा 'ड्रग और मेडिकल माफिया' सक्रिय है, जिसकी जड़ें पाताल तक जा चुकी हैं। रीवा और नवगठित जिले मऊगंज में स्वास्थ्य सेवा अब सेवा नहीं, बल्कि 'सफेदपोश लूट' का सबसे बड़ा जरिया बन चुकी है। गली-कूचों में कुकुरमुत्तों की तरह खुले मेडिकल स्टोर अब दवा की दुकानों के बजाय 'अघोषित क्लिनिक' और 'लूट के अड्डों' में तब्दील हो गए हैं।
30 हजार की 'दिहाड़ी' पर डॉक्टर: आखिर कौन चुका रहा है कीमत?
क्षेत्रीय चर्चाओं और विश्वस्त सूत्रों की मानें तो इन मेडिकल स्टोर्स और निजी नर्सिंग होम के बीच डॉक्टरों को बैठाने की होड़ मची है। विशेषज्ञता के आधार पर डॉक्टरों को 3,000 रुपये से लेकर 30,000 रुपये प्रतिदिन तक का भारी-भरकम मानदेय (रिटेनरशिप) दिया जा रहा है। सवाल यह है कि यदि एक संचालक डॉक्टर को रोज इतनी बड़ी रकम दे रहा है, तो वह मुनाफा कहाँ से कमा रहा है? जवाब साफ है—गरीब मरीजों की जेब से। गैर-जरूरी पैथोलॉजी टेस्ट, महंगी दवाइयों पर मोटा कमीशन और जबरन थमाई गई दवाइयों की फेहरिस्त ही इस 'काले खेल' का आधार है।
ईमानदारी पीछे छूटी, माफिया हुए 'अरबपति'
विंध्य के इस बाजार में आज भी कुछ पुराने सिद्धांतवादी नर्सिंग होम और मेडिकल स्टोर मौजूद हैं, जो ईमानदारी के कारण आज भी वहीं खड़े हैं जहाँ सालों पहले थे। इसके विपरीत, 'दवा माफिया' के रूप में उभरे कुछ चेहरे आज अरबों-खरबों की चल-अचल संपत्ति के मालिक बन चुके हैं। क्षेत्र में यह मांग जोर पकड़ रही है कि यदि इन संचालकों की संपत्ति की निष्पक्ष जांच की जाए, तो आय से अधिक संपत्ति के ऐसे खुलासे होंगे जो पूरे प्रदेश को चौंका देंगे।
सरकारी तंत्र को खोखला करने की साजिश
यह माफिया केवल आर्थिक लूट तक सीमित नहीं है। एक सोची-समझी रणनीति के तहत शासकीय स्वास्थ्य सेवाओं की छवि धूमिल की जा रही है। मोबाइल स्टिंग और छोटी-छोटी कमियों को तिल का ताड़ बनाकर सोशल मीडिया पर उछाला जाता है, ताकि जनता का भरोसा सरकारी अस्पतालों से उठ जाए। इस डर और अविश्वास के माहौल का फायदा उठाकर मरीजों को इन 'निजी लुटेरों' की शरण में धकेला जाता है। रसूख का आलम यह है कि सरकारी तंत्र के जिम्मेदार भी इनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
कलेक्टरों के 'एक्शन' का इंतज़ार: क्या टूटेगा माफिया का तिलस्म?
रीवा और मऊगंज के वर्तमान जिला कलेक्टरों की कार्यशैली से जनता को भारी उम्मीदें हैं। मऊगंज कलेक्टर जहाँ अपनी ऊर्जावान कार्यप्रणाली के लिए जाने जाते हैं, वहीं रीवा कलेक्टर से भी कड़े फैसलों की अपेक्षा है। अब सवाल यह है कि:
क्या प्रशासन इन 'राजनीतिक संरक्षण' प्राप्त सफेदपोशों पर नकेल कसेगा?
क्या उन संस्थानों की उच्च स्तरीय जांच होगी जिन्होंने चंद सालों में अरबों की संपत्ति बनाई है?
क्या जिला प्रशासन राजनीतिक दबाव को दरकिनार कर आम जनता को इस 'मेडिकल टेरर' से निजात दिला पाएगा?
विंध्य की जागरूक जनता अब कलेक्टरों के उस 'हंटर' का इंतजार कर रही है, जो इस माफिया राज को जड़ से उखाड़ फेंके।
