रीवा और मऊगंज के ग्रामीण अंचलों में आधुनिकता की अंधी दौड़, जागरूकता के अभाव में बीमारियों को न्योता Aajtak24 News

रीवा और मऊगंज के ग्रामीण अंचलों में आधुनिकता की अंधी दौड़, जागरूकता के अभाव में बीमारियों को न्योता Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - विकास की चकाचौंध और शहरी जीवनशैली की नकल ने आज गांवों की सूरत बदल दी है। रीवा और मऊगंज जिले के सुदूर ग्रामीण अंचलों में अब फ्रिज, कूलर और वॉशिंग मशीन जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण विलासिता नहीं, बल्कि जरूरत और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गए हैं। बाजार से खरीद के साथ-साथ विवाह समारोहों में उपहार और दहेज के रूप में फ्रिज की बढ़ती आमद ने हर घर में इसकी उपस्थिति दर्ज करा दी है। लेकिन, सुविधा का यह साधन अब ग्रामीण स्वास्थ्य के लिए एक नया संकट बनकर उभर रहा है। जानकारी और जागरूकता की कमी के कारण लोग फ्रिज का गलत उपयोग कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर गंभीर बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।

अज्ञानता बन रही बीमारियों की जड़

विशेषज्ञों के अनुसार, फ्रिज को हर वस्तु सुरक्षित रखने का "जादुई डिब्बा" मानना एक बड़ी भूल है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य जागरूकता की कमी के कारण लोग कई दिनों तक गूंथा हुआ आटा, पका हुआ भोजन, सब्जियां और फल फ्रिज में ठूंस देते हैं। लंबे समय तक फ्रिज में रखे खाद्य पदार्थों में बैक्टीरिया पनपने लगते हैं और उनकी पौष्टिकता समाप्त हो जाती है। परिणामतः, ग्रामीणों में पेट संबंधी रोग, फूड पॉइजनिंग, एलर्जी और संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

इन चीजों को फ्रिज में रखना है हानिकारक

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि कुछ विशेष खाद्य पदार्थों को फ्रिज में रखने से वे जहरीले या बेस्वाद हो सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं:

  • सब्जियां व फल: प्याज, आलू, लहसुन, टमाटर, केला और खीरा।

  • अन्य सामग्रियां: तुलसी की पत्तियां, ब्रेड, शिमला मिर्च, कटे हुए फल और उबला हुआ तेल।

  • गूंथा आटा: महिलाएं समय बचाने के लिए रात में आटा गूंथकर फ्रिज में रख देती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।

महिलाओं पर समय का दबाव और बदलती आदतें

ग्रामीण परिवेश में महिलाएं घर के भारी कामकाज के बीच समय बचाने के लिए अक्सर बासी भोजन और गूंथे हुए आटे का सहारा लेती हैं। सुबह की जल्दबाजी में रात का बचा भोजन या आटा उपयोग में लाना भले ही आसान लगे, लेकिन बार-बार भोजन को गर्म और ठंडा करने से उसकी जैविक संरचना बदल जाती है, जो शरीर के पाचन तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

ठंडे पानी और प्लास्टिक का बढ़ता मोह

भीषण गर्मी में फ्रिज के अत्यधिक ठंडे पानी का चलन बढ़ा है। शादियों और आयोजनों में प्लास्टिक की बोतलों और पाउच में मिलने वाला "चिल्ड" पानी गले के संक्रमण और पाचन शक्ति को कमजोर कर रहा है। साथ ही, प्लास्टिक में लंबे समय तक बंद पानी रसायनों के कारण स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो रहा है।

मिट्टी की महक और परंपराएं हुई ओझल

एक दौर था जब गांवों में मिट्टी के घड़े, सुराही और बांस की टोकरियों का उपयोग होता था। ये तरीके न केवल वैज्ञानिक रूप से सही थे, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी थे। प्याज-लहसुन को खुले स्थानों पर रखना और ताजे भोजन का सेवन करना ग्रामीणों की लंबी आयु का राज था, जो अब आधुनिकता की भेंट चढ़ गया है।

जागरूकता ही एकमात्र समाधान

प्रशासन, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और स्वयंसेवी संस्थाओं को अब गांवों की ओर रुख करना होगा। दिखावे की इस दौड़ में स्वास्थ्य को पीछे छूटने से बचाने के लिए जागरूकता अभियान अनिवार्य हैं। लोगों को यह समझना होगा कि फ्रिज एक सुविधा है, लेकिन इसका गलत इस्तेमाल जीवन के लिए भारी पड़ सकता है। विकास तभी सार्थक है जब वह स्वास्थ्य की कीमत पर न हो।

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