![]() |
| व्यवस्था परिवर्तन की आस या महज प्रशासनिक हलचल? भ्रष्टाचार की 'ज्वाला' में झुलसता जिला Aajtak24 News |
रीवा - विंध्य की हृदयस्थली रीवा इन दिनों विकास की चमक से कहीं ज्यादा भ्रष्टाचार की गहरी सड़ांध के कारण चर्चा में है। जिले का शायद ही कोई ऐसा कोना या विभाग बचा हो, जहां भ्रष्टाचार की जड़ें पाताल तक न धंसी हों। हालांकि, वर्तमान कलेक्टर की पिछले दो दिनों की 'मैदानी सक्रियता' ने सो रहे विभागों में हड़कंप जरूर मचाया है, लेकिन आम जनमानस के मन में एक ही यक्ष प्रश्न कौंध रहा है—क्या यह केवल चंद दिनों की प्रशासनिक हलचल है या वाकई व्यवस्था परिवर्तन का कोई ठोस आगाज?
राजस्व की 'नीलामी' और खोखली होती धरती
जिले में सबसे भयावह स्थिति राजस्व न्यायालयों की है। आरोप लग रहे हैं कि न्याय के मंदिर अब 'नीलामी के केंद्र' में तब्दील हो चुके हैं, जहां फाइलों का वजन नहीं, बल्कि चढ़ावे का वजन तय करता है कि फैसला किसके पक्ष में होगा। वहीं दूसरी ओर, खनिज विभाग की कथित मिलीभगत ने रीवा की कोख को उजाड़ दिया है। मिट्टी, मोरम और पत्थरों का अवैध उत्खनन इतनी बेरहमी से जारी है कि जिले की धरती अंदर से खोखली हो चुकी है। सरकारी फाइलों में जो खनिज सुरक्षित है, वह धरातल से गायब हो चुका है।
विभाग दर विभाग: भ्रष्टाचार का अंतहीन संजाल
जिले के प्रशासनिक ढांचे पर नजर डालें तो हर विभाग अपनी एक अलग 'करप्शन स्टोरी' कह रहा है:
खाद्य विभाग की धांधली: रीवा में गरीबी रेखा का राशन उन घरों तक पहुँच रहा है जिनके दरवाजों पर चार पहिया वाहन खड़े हैं। असली पात्र व्यक्ति आज भी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। धान-गेहूं खरीदी केंद्रों से लेकर गोदामों के भंडारण तक, भ्रष्टाचार का एक ऐसा टापू बन चुका है जिसे भेदना आसान नहीं।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास: यहाँ का आलम यह है कि पुराने रिकॉर्ड्स गायब कर दिए जाते हैं ताकि पुरानी धांधलियों की कभी परत न खुल सके। कागजों पर गांव स्मार्ट बन रहे हैं, लेकिन धरातल पर योजनाएं दम तोड़ रही हैं।
बिजली और बुनियादी ढांचा: भीषण गर्मी के बीच जर्जर ट्रांसफार्मर और झूलते तार हादसों को आमंत्रण दे रहे हैं। जल जीवन मिशन से लेकर महिला बाल विकास तक, हर जगह नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
कलेक्टर की असली परीक्षा: विज्ञापनों वाला विकास बनाम जमीनी सच
वर्तमान प्रशासनिक मुखिया के सामने चुनौतियों का हिमालय खड़ा है। भ्रष्टाचार अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि 'संस्थागत' हो चुका है। कलेक्टर की नई कार्यप्रणाली से भ्रष्ट अधिकारियों में 'कानून का खौफ' तो दिखा है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब खुफिया रिपोर्टों पर कठोरता से अमल होगा। क्या गोदामों में रखे अनाज का भौतिक सत्यापन होगा? क्या अवैध उत्खनन पर केवल जुर्माना लगेगा या माफिया की कमर तोड़ी जाएगी? रीवा की जनता अब सरकारी विज्ञापनों वाले 'कागजी विकास' से ऊब चुकी है। उसे ऐसा पारदर्शी प्रशासन चाहिए जहां गरीब की सुनवाई हो और न्याय बिकाऊ न हो। अब देखना यह है कि वर्तमान प्रशासन इस 'दीमक' रूपी भ्रष्टाचार का सफाया कर पाता है या यह मुहिम भी वक्त की धूल में दबकर महज एक चुनावी स्टंट बनकर रह जाएगी।
