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| विशेष पड़ताल: 'सेवा शुल्क' या शिष्टाचार? रीवा-मऊगंज में विकास की बलि चढ़ती 'कमीशन' वाली हकीकत Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - विंध्य की पावन धरा, जहाँ एक ओर 'रामराज' और 'सनातन मूल्यों' का उद्घोष हो रहा है, वहीं दूसरी ओर विकास कार्यों की आड़ में भ्रष्टाचार की दीमक सिस्टम को खोखला कर रही है। रीवा और नवगठित मऊगंज जिले में इन दिनों '2 प्रतिशत सेवा शुल्क' की चर्चा गलियों से लेकर सोशल मीडिया तक आम है। अब सवाल यह उठता है कि क्या यह केवल एक राजनीतिक आरोप है या फिर विकास की गंगा में बहता वह 'शिष्टाचार', जिसे अब प्रशासन और ठेकेदारों ने व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा मान लिया है?
ठेकेदारों का दर्द: 'बिना चढ़ावे के नहीं हिलती फाइल'
क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्यों की हकीकत किसी से छुपी नहीं है। सूत्रों की मानें तो किसी भी मद का काम हो, ठेकेदारों के बीच एक अनकहा 'ब्लैक लॉ' लागू है— 2 प्रतिशत की अनिवार्य भेंट। चर्चा है कि यदि कोई ठेकेदार इस 'सेवा शुल्क' को देने में आनाकानी करता है, तो स्थानीय जनप्रतिनिधियों के इशारे पर उनके समर्थकों द्वारा कार्यों में तकनीकी खामियां निकालकर विरोध प्रदर्शन का नाटक शुरू कर दिया जाता है। दबाव इतना होता है कि ठेकेदार को नतमस्तक होना ही पड़ता है।
निधि के कार्यों में 25 प्रतिशत तक की 'लूट'
इससे भी भयावह स्थिति 'माननीय' की स्वेच्छानुदान, विधायक निधि या सांसद निधि से होने वाले छोटे कार्यों की है। ठेकेदारों और स्थानीय जानकारों की मानें तो यहाँ कमीशन का आंकड़ा 20 से 25 प्रतिशत तक पहुँच जाता है। जब एक चौथाई पैसा 'सेटलमेंट' में चला जाए, तो निर्माण की गुणवत्ता क्या होगी, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यही कारण है कि बनने के कुछ महीनों बाद ही सड़कें उखड़ने लगती हैं और दीवारें दरकने लगती हैं।
ऑडियो-वीडियो वायरल, फिर भी तंत्र मौन क्यों?
डिजिटल युग में भ्रष्टाचार के कई कथित ऑडियो और वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं, जिनमें स्पष्ट रूप से लेनदेन की बातें सुनी जा सकती हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि प्रशासन और सरकार इन पर मौन साधे हुए हैं। आखिर इन वायरल साक्ष्यों पर ठोस दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या इन्हें 'साजिश' बताकर रद्दी की टोकरी में डालना ही 'जीरो टॉलरेंस' है?
शिष्टाचार की नई परिभाषा: 'थोड़ा-बहुत तो चलता है'
एक तरफ सरकार वैदिक मूल्यों और सुशासन का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर कुछ 'रामसेवकों' ने भ्रष्टाचार की नई परिभाषा गढ़ ली है। तर्क दिया जाता है कि— "यह भ्रष्टाचार नहीं, संगठन चलाने के लिए दिया गया शिष्टाचार है।" लेकिन सवाल यह है कि जनता की गाढ़ी कमाई और उनके हक का पैसा 'शिष्टाचार' के नाम पर डकारना कितना न्यायसंगत है?
नारों में 'रामराज', धरातल पर 'कमीशन राज'
प्रशासन को चाहिए कि इन वायरल वीडियो की फोरेंसिक जांच कराकर दोषियों को बेनकाब करे। यदि समय रहते इस 'प्रतिशत संस्कृति' पर लगाम नहीं कसी गई, तो विकास की इमारतें केवल कागजों पर खड़ी होंगी। जनता के बीच बढ़ता यह आक्रोश आने वाले समय में सत्ता के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। क्या 'जीरो टॉलरेंस' की नीति फाइलों से बाहर निकलकर धरातल पर उतरेगी? यह विंध्य की जनता का सबसे बड़ा सवाल है।
