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| मिशन या कमीशन? रीवा-मऊगंज में 'चौथे स्तंभ' की साख पर लगा ग्रहण Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - लोकतंत्र के तीन स्तंभों—कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका—पर पैनी नजर रखने के लिए समाज ने जिस 'चौथे स्तंभ' (मीडिया) को सेतु माना था, आज वह खुद ही सवालों के घेरे में है। रीवा और मऊगंज जिलों में यह सेतु भ्रष्टाचार, व्यक्तिगत स्पर्धा और अनैतिकता की भेंट चढ़कर जर्जर हो चुका है। विडंबना यह है कि जिन कंधों पर जनहित की रक्षा का भार था, वे आज कथित मेडिकल माफियाओं और अवैध कारोबारियों के हाथों की कठपुतली बनकर रह गए हैं।
पैकेज और प्रमाण पत्र का 'गंदा' खेल
जिले में आरटीआई (सूचना का अधिकार) और पत्रकारिता अब जनसेवा का माध्यम न रहकर 'कॉर्पोरेट प्रतिद्वंद्विता' का घातक हथियार बन चुकी है। रसूखदार गुटों के बीच की आपसी लड़ाई में पत्रकारों और आरटीआई कार्यकर्ताओं को मोहरों की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। खेल का तरीका बेहद संगठित है: एक पक्ष दूसरे की 'बखिया उधेड़ने' के लिए सूचनाएं निकलवाता है या नकारात्मक खबरें छपवाता है। जैसे ही पर्दे के पीछे 'पैकेज' (रकम) फिक्स होती है, वैसे ही विरोध के स्वर ठंडे पड़ जाते हैं और कल तक एक-दूसरे को कोसने वाले लोग आज एक-दूसरे को 'ईमानदारी का प्रमाण पत्र' बांटते नजर आते हैं।
यूट्यूब और डिजिटल मीडिया की अपारदर्शी दुनिया
डिजिटल क्रांति ने हर हाथ में कैमरा और माइक तो थमा दिया, लेकिन नैतिकता का पाठ पढ़ाना भूल गई। रीवा और मऊगंज में यूट्यूब चैनलों की बाढ़ आ गई है। नर्सिंग होम, निजी स्कूलों और अन्य संस्थानों से विज्ञापन लेना व्यापारिक दृष्टिकोण से गलत नहीं है, लेकिन अनैतिकता तब शुरू होती है जब विज्ञापन की आड़ में 'ब्लैकमेलिंग' और 'फिक्सिंग' का खेल शुरू होता है। छोटे अखबारों से लेकर बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तक, विज्ञापन की दरें और अधिकार क्षेत्र सार्वजनिक नहीं होने के कारण यह पूरी दुनिया अपारदर्शी और संदेहास्पद हो गई है।
बेरोजगारी का 'शॉर्टकट' बनी पत्रकारिता
क्षेत्र में बढ़ती बेरोजगारी के बीच पत्रकारिता अब एक जिम्मेदारी से ज्यादा 'सुरक्षा कवच' बन गई है। वर्तमान में रीवा और मऊगंज में इनकी संख्या हजारों में है। गले में 'प्रेस' का पट्टा डाले, दुपहिया और चौपहिया गाड़ियों का काफिला गांव-गांव में आंगनबाड़ी केंद्रों, पंचायतों, प्रॉपर्टी डीलरों और झोलाछाप डॉक्टरों के ठिकानों पर 'दबिश' देता आम देखा जा सकता है। पुलिस थानों और चौकियों में इनकी बढ़ती सक्रियता जनहित के लिए कम, बल्कि अपने निजी रसूख और आर्थिक 'सेटलमेंट' के लिए ज्यादा दिखाई देती है।
पारदर्शिता पर सुलगते सवाल
इस गिरते स्तर ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
आय के स्रोत का ऑडिट क्यों नहीं? आरटीआई कानून पारदर्शिता के लिए लाया गया था, लेकिन आरटीआई लगाने वालों की आर्थिक पृष्ठभूमि की जांच क्यों नहीं होती? भारी-भरकम भागदौड़ और शुल्कों के लिए इनके पास फंड कहाँ से आता है?
जवाबदेही किसकी? जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो न्यायपालिका और कार्यपालिका का निष्पक्ष निरीक्षण कैसे होगा?
संविधान बनाम उपमा: हालांकि संविधान ने मीडिया को औपचारिक रूप से चौथा स्तंभ नहीं माना है, लेकिन समाज द्वारा दी गई इस उपमा की लाज रखना इन कार्यकर्ताओं की नैतिक जिम्मेदारी थी, जिसमें वे विफल होते दिख रहे हैं।
दासी बनती पत्रकारिता
आज पत्रकारिता धीरे-धीरे पूंजीपतियों के मालिकाना हक की दासी बनती जा रही है। यदि आरटीआई कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की इस जमात की जवाबदेही तय नहीं की गई और उनकी 'आय के सूत्रों' की जांच नहीं हुई, तो लोकतंत्र की मंशा केवल सरकारी फाइलों तक ही दफन होकर रह जाएगी। समाज आज गर्व करने के बजाय इन विसंगतियों पर क्षोभ जता रहा है। अब समय आ गया है कि प्रशासन और जागरूक नागरिक इस जर्जर होते सेतु को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएं।
