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| महापरिवर्तन की दहलीज पर समाज: देर से विवाह और सिमटते रिश्तों ने खड़ा किया भविष्य का संकट Aajtak24 News |
रीवा - आधुनिकता की चकाचौंध, करियर की अंधी दौड़ और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती चाहत ने भारत की सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था को एक नए और अनिश्चित मोड़ पर खड़ा कर दिया है। विंध्य क्षेत्र सहित पूरे देश में आज यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि क्या हम एक ऐसे युग की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ 'परिवार' शब्द केवल इतिहास की किताबों तक सीमित रह जाएगा? शिक्षा और आत्मनिर्भरता के इस दौर में विवाह की बढ़ती उम्र, घटती जन्मदर और बिखरती संयुक्त परिवार प्रथा ने समाजशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
1. विवाह की बढ़ती उम्र: जैविक और सामाजिक घड़ी का संघर्ष
एक दशक पहले तक भारतीय समाज में 22 से 25 वर्ष की आयु विवाह के लिए आदर्श मानी जाती थी। आज यह सीमा खिसक कर 30 से 35 वर्ष के बीच पहुँच गई है।
करियर बनाम गृहस्थी: युवा पहले अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहते हैं, फिर एक स्थिर नौकरी और अंत में 'सेटल्ड' होने के बाद विवाह का विचार करते हैं।
पीढ़ियों का अंतर: विशेषज्ञों का मानना है कि देर से विवाह होने के कारण दो पीढ़ियों के बीच का अंतर (Generation Gap) इतना बढ़ जाता है कि बच्चों और माता-पिता के बीच वैचारिक तालमेल बिठाना कठिन हो रहा है। पहले जहाँ 100 साल में पाँच पीढ़ियां दिखती थीं, अब उनकी संख्या घटकर तीन रह गई है।
2. प्राथमिकताएं बदलीं: आत्मनिर्भरता या अनिच्छा?
आज की युवा पीढ़ी, विशेषकर युवतियों के लिए शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता अब विवाह से अधिक महत्वपूर्ण है।
स्वतंत्र निर्णय: समाजशास्त्री डॉक्टर वर्मा के अनुसार, "आज की महिला अब विवाह को अपनी पहचान का आधार नहीं मानती। वह अपनी शर्तों पर जीना चाहती है।"
रिश्तों की तलाश में भटकते अभिभावक: रीवा जैसे शहरों में भी ऐसे हजारों परिवार हैं जहाँ माता-पिता योग्य जीवनसाथी की तलाश में सालों गुजार रहे हैं, लेकिन युवाओं की 'परफेक्ट पार्टनर' की कसौटी और विवाह के प्रति उदासीनता के कारण बात नहीं बन पा रही है।
3. सिमटता रिश्तों का संसार: 'चाचा-बुआ' विहीन होगी अगली पीढ़ी?
शहरीकरण और 'हम दो हमारे एक' की नीति ने पारिवारिक संरचना को पूरी तरह बदल दिया है।
रक्त संबंधों का संकुचन: यदि एक दंपति केवल एक संतान पैदा करता है, तो अगली पीढ़ी के पास न कोई भाई होगा, न बहन। इसका परिणाम यह होगा कि भविष्य के बच्चों के पास चाचा, ताऊ, मामा, बुआ या मौसी जैसे सुरक्षा देने वाले रिश्ते ही नहीं होंगे।
एकाकीपन का दंश: छोटे होते परिवारों के कारण 'सपोर्ट सिस्टम' खत्म हो रहा है। अकेलेपन की वजह से युवाओं में तनाव और बुजुर्गों में अवसाद (Depression) की समस्या महामारी की तरह फैल रही है।
4. जनसंख्या असंतुलन और आर्थिक प्रभाव
यह केवल एक सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ी आर्थिक चुनौती भी है।
बुजुर्गों का समाज: जापान और कई यूरोपीय देशों की तरह यदि भारत में भी जन्मदर गिरती रही, तो भविष्य में काम करने वाले युवाओं की कमी हो जाएगी और आश्रित बुजुर्गों की संख्या बढ़ जाएगी।
संवेदनशीलता में कमी: सामूहिक परिवारों में बच्चा साझा मूल्यों और संवेदनाओं के साथ बड़ा होता था। एकल परिवारों में पला-बढ़ा बच्चा अक्सर 'स्व-केंद्रित' (Self-centered) हो जाता है, जो समाज के लिए घातक है।
5. समाधान की तलाश: आधुनिकता और परंपरा का समन्वय
इस समस्या का हल किसी एक पक्ष के पास नहीं है। इसके लिए समाज को बहुआयामी प्रयास करने होंगे:
कार्य-जीवन संतुलन (Work-Life Balance): कॉर्पोरेट और सरकारी तंत्र को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जहाँ युवा अपने करियर के साथ-साथ परिवार को भी समय दे सकें।
विवाह का सरलीकरण: विवाह को फिजूलखर्ची और दिखावे का माध्यम बनाने के बजाय एक सरल 'साझेदारी' के रूप में प्रमोट करना होगा।
संवाद की जरूरत: अभिभावकों और युवाओं के बीच शादी को लेकर स्वस्थ संवाद होना चाहिए, न कि दबाव।
सामाजिक सुरक्षा: सरकार को बाल-देखभाल (Child care) और मातृत्व लाभ जैसी सुविधाओं को और सुलभ बनाना होगा ताकि कामकाजी महिलाएं परिवार बढ़ाने से न डरें।
संतुलन ही एकमात्र विकल्प
परिवर्तन प्रकृति का नियम है, लेकिन ऐसा परिवर्तन जो समाज की बुनियादी इकाई 'परिवार' को ही नष्ट कर दे, वह आत्मघाती हो सकता है। हमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच एक महीन रेखा खींचनी होगी। यदि हम आधुनिक बनते-बनते अपनी जड़ों से पूरी तरह कट गए, तो आने वाली पीढ़ियां भौतिक रूप से संपन्न तो होंगी, लेकिन भावनात्मक रूप से विपन्न रह जाएंगी। आज समय की मांग है कि हम प्रगति के साथ-साथ उन पारिवारिक मूल्यों को भी सहेजें, जो हमें एक संवेदनशील इंसान और एक संगठित समाज बनाते हैं।
