रीवा के 'मौन' सांसद: संसद में 100% हाजिरी, पर विंध्य के मुद्दों पर शून्य बोल; आंकड़ों ने खोली सक्रियता की पोल Aajtak24 News

रीवा के 'मौन' सांसद: संसद में 100% हाजिरी, पर विंध्य के मुद्दों पर शून्य बोल; आंकड़ों ने खोली सक्रियता की पोल Aajtak24 News

रीवा - लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी 18वीं लोकसभा से जो ताज़ा आंकड़े निकलकर सामने आए हैं, उन्होंने रीवा और नवगठित मऊगंज जिले की जनता को गहरे सोच में डाल दिया है। सांसदों की सक्रियता पर जारी इस रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि रीवा के सांसद जनार्दन मिश्रा सदन में मौजूद तो रहे, लेकिन 'मौन' व्रत धारण कर। जहां एक ओर मध्यप्रदेश के सांसदों का बोलने का औसत समय पहले ही कम रहा, वहीं रीवा सांसद उन 5 प्रमुख भाजपा सांसदों में शामिल हैं जिन्होंने पूरे सत्र के दौरान सदन में एक बार भी अपना मुंह नहीं खोला।

हाजिरी में अव्वल, जनहित में शून्य

रिपोर्ट के आंकड़े किसी विडंबना से कम नहीं हैं। सांसद जनार्दन मिश्रा की सदन में उपस्थिति 100 प्रतिशत दर्ज की गई है। यानी वे हर दिन सदन की कार्यवाही में शामिल होने दिल्ली तो पहुँचे, लेकिन रीवा और विंध्य की आवाज़ उठाने के मामले में उनका स्कोर 'शून्य' रहा। रीवा की जनता अब सवाल पूछ रही है कि जब सदन के पटल पर क्षेत्र की समस्याओं को रखना ही नहीं था, तो यह शत-प्रतिशत उपस्थिति किस काम की?

विंध्य की समस्याओं पर छाई चुप्पी

रीवा और मऊगंज जिला आज कई गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। क्षेत्र में बेरोजगारी का आलम यह है कि युवा पलायन को मजबूर हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्थाएं बदहाल हैं, और नशे का काला कारोबार रीवा की रगों में ज़हर घोल रहा है। इसके अलावा मेडिकल सुविधाओं का अभाव और जर्जर सड़कें आम जनता की नियति बन चुकी हैं। हैरानी की बात यह है कि 'ऊर्जावान' और मुखर माने जाने वाले सांसद जी ने इनमें से किसी भी बुनियादी मुद्दे पर संसद में आवाज़ उठाना ज़रूरी नहीं समझा।

खड़ाऊं की राजनीति और जनता की हताशा

क्षेत्र में यह चर्चा तेज़ है कि सांसद जी ने शायद 'पद-चिह्नों' पर चलने को ही अपनी उपलब्धि मान लिया है। जनता के बीच यह तंज कसा जा रहा है कि सिंहासन पर 'खड़ाऊं' रखकर सत्ता का संचालन तो हो रहा है, लेकिन वास्तविक जनसेवा और मुखर नेतृत्व गायब है। जिस रीवा ने उन्हें भारी जनादेश दिया, उसे संसद की गरिमापूर्ण चर्चाओं में केवल सन्नाटा मिला। अपने बयानों से अक्सर चर्चा में रहने वाले सांसद जी ने विंध्य की आवाज़ को पूरी तरह से दबा दिया है।

देशभर में मप्र की स्थिति और रीवा का स्थान

देश के 543 सांसदों में से 425 ने सदन की किसी न किसी चर्चा में भाग लिया। मध्यप्रदेश के सांसदों के बोलने का औसत समय महज 4 घंटे 23 मिनट रहा, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। लेकिन इस सूची में सबसे निचली पायदान पर उन 24 'मौन' सांसदों का होना, जिनमें रीवा सांसद शामिल हैं, पूरे विंध्य क्षेत्र के लिए आत्मचिंतन और निराशा का विषय है। एक ओर सरकार पारदर्शिता और जवाबदेही का दावा करती है, वहीं रीवा सांसद का यह मौन उनके संसदीय दायित्वों पर सवाल खड़ा करता है। जनता ने वोट 'आवाज़' बनने के लिए दिया था, 'मूकदर्शक' बनने के लिए नहीं। अब देखना होगा कि इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद सांसद जी अपनी कार्यप्रणाली में क्या बदलाव लाते हैं।

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