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| विंध्य का स्वास्थ्य ढांचा 'आईसीयू' में: रसूखदारों के गृह क्षेत्र में इलाज के लिए दर-दर भटकती जनता Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - मध्य प्रदेश की राजनीति में 'सत्ता का पावर हाउस' कहे जाने वाले विंध्य क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था आज खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। विडंबना देखिए कि जिस क्षेत्र ने प्रदेश को दिग्गज नेता और स्वास्थ्य महकमे के कर्ता-धर्ता दिए, उसी क्षेत्र की जनता आज एक अदद बेहतर इलाज के लिए 'पलायन' करने को मजबूर है। रीवा और मऊगंज जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर इस कदर गिर चुका है कि मामूली सर्जरी हो या गंभीर बीमारी, एम्बुलेंस के पहिए सीधे बनारस, प्रयागराज, जबलपुर या नागपुर की ओर मुड़ जाते हैं। सवाल यह है कि क्या करोड़ों के सरकारी बजट और विकास के दावों की हकीकत सिर्फ कागजों तक सीमित है?
गाँवों में बिछा मौत का जाल: झोलाछापों का राज
रीवा और मऊगंज जिले के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से 4000 से अधिक अवैध झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे है। ये कथित डॉक्टर, जिनके पास न तो कोई वैध डिग्री है और न ही अनुभव, वे बेखौफ होकर बीपी, शुगर से लेकर कैंसर और जटिल फ्रैक्चर तक का इलाज कर रहे हैं। प्रशासन की नाक के नीचे चल रहे इस खेल ने गाँवों को 'एक्सपेरिमेंट लैब' बना दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्वास्थ्य विभाग ने आज तक इन अवैध केंद्रों को चिन्हित कर उन पर बुलडोजर क्यों नहीं चलाया? चर्चा आम है कि इन अवैध क्लीनिकों से हर महीने एक मोटा 'सेवा शुल्क' संबंधित विभागों तक पहुँचता है, जिसके कारण इन पर कार्रवाई की फाइलें दबी रह जाती हैं।
प्राइवेट नर्सिंग होम: चकाचौंध के पीछे का 'अंधेरा'
रीवा और मऊगंज में कुकुरमुत्ते की तरह खुले प्राइवेट नर्सिंग होम आज सेवा के बजाय 'शुद्ध व्यवसाय' के केंद्र बन चुके हैं।
डिग्रियों का खेल: कई अस्पतालों के बाहर बड़े-बड़े विशेषज्ञों के नाम लिखे हैं, लेकिन अंदर जाने पर पता चलता है कि वे डॉक्टर सिर्फ कागजों पर तैनात हैं। उनकी डिग्रियों का मासिक किराया देकर कम अनुभवी लोग मरीजों का इलाज कर रहे हैं। क्या यह मरीजों के साथ धोखाधड़ी नहीं है?
आयुष्मान कार्ड का शोषण: प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना का उद्देश्य गरीबों को मुफ्त इलाज देना था, लेकिन विंध्य में यह कई अस्पतालों के लिए 'मनी मेकिंग मशीन' बन गई है। अनावश्यक सर्जरी और फर्जी भर्ती दिखाकर सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगाया जा रहा है। यदि इन दावों की निष्पक्ष जांच हो, तो प्रदेश का सबसे बड़ा स्वास्थ्य घोटाला सामने आना तय है।
सरकारी तंत्र की सुस्ती और डॉक्टरों की दोहरी चाल
क्षेत्र के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी नहीं है, लेकिन समर्पण की भारी कमी है। आरोप हैं कि कई सरकारी डॉक्टर अपने ड्यूटी के घंटों में सरकारी अस्पताल के बजाय निजी नर्सिंग होम में सेवाएं देते हैं या खुद के मेडिकल स्टोर और लैब संचालित करते हैं। जब सरकारी तंत्र का मुख्य हिस्सा ही निजी लाभ में व्यस्त होगा, तो जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में गरीब मरीज को न्याय कैसे मिलेगा?
जनता की मांग: अब कड़े फैसलों का वक्त
विंध्य की जनता अब केवल आश्वासनों से थक चुकी है। सोशल मीडिया और धरातल पर उठ रही आवाजों ने प्रशासन के सामने कुछ तीखे सवाल रखे हैं:
संयुक्त जांच टीम: जिला प्रशासन, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की एक जॉइंट टीम बने जो थाना स्तर पर अवैध क्लीनिकों को बंद कराए।
विशेषज्ञों का भौतिक सत्यापन: सीएमएचओ (CMHO) कार्यालय यह सुनिश्चित करे कि नर्सिंग होम के बोर्ड पर लिखे डॉक्टर वाकई वहाँ बैठते हैं या नहीं।
सरकारी डॉक्टरों पर नकेल: बायोमेट्रिक हाजिरी और लोकेशन ट्रैकिंग के जरिए यह सुनिश्चित हो कि सरकारी डॉक्टर अपने निर्धारित समय पर अस्पताल में ही मौजूद रहें।
साख का सवाल
जब तक स्वास्थ्य मंत्री के अपने गृह क्षेत्र में लोग इलाज के अभाव में दम तोड़ते रहेंगे या पड़ोसी राज्यों की ओर भागेंगे, तब तक विकास के सारे दावे खोखले नजर आएंगे। यूट्यूब और अन्य संचार माध्यमों पर छप रही बदहाली की खबरें यह बताने के लिए काफी हैं कि अब पानी सिर के ऊपर जा चुका है। विंध्य की जनता अब अपने संवैधानिक अधिकार 'स्वास्थ्य' के लिए सड़कों पर उतरने को तैयार है। क्या प्रशासन इस बार कोई ठोस कार्रवाई करेगा या एक बार फिर फाइलें ठंडे बस्ते में चली जाएंगी?
