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| पर उपदेश कुशल बहुतेरे", खुद RTI से खोलते हैं पोल, पर खुद का आशियाना तालाब की मेड़ पर Aajtak24 News |
रीवा - रीवा जिले के ग्रामीण अंचलों में इन दिनों एक कहावत बड़ी मशहूर हो रही है— "दीपक तले अंधेरा"। मामला एक ऐसे तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता से जुड़ा है, जो सरकारी दफ्तरों में आरटीआई (RTI) लगाकर अधिकारियों की नींद उड़ाने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन अब वही खुद 'अतिक्रमण' के आरोपों के घेरे में हैं। गांव की चौपालों पर चर्चा है कि जो व्यक्ति पंचायत से लेकर आंगनबाड़ी तक की व्यवस्थाओं में पारदर्शिता का पाठ पढ़ाता है, उसका अपना वजूद एक सरकारी तालाब की मेड़ पर अवैध कब्जे के सहारे टिका है।
RTI का 'हथियार' और अतिक्रमण की 'ढाल'
ग्रामीणों के अनुसार, यह सामाजिक कार्यकर्ता सूचना के अधिकार का उपयोग करने में खासे दक्ष हैं। उन्होंने कई विभागों से जानकारी निकालकर भ्रष्टाचार उजागर करने के दावे किए हैं। प्रशासन भी उनकी शिकायतों पर अक्सर दौड़ता नजर आता है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस तालाब को गांव की 'धरोहर' होना चाहिए था, उसी की छाती पर उक्त कार्यकर्ता ने अपनी झोपड़ी तान दी है।
तालाब की 'बलि' और ग्रामीणों का आक्रोश
आरोप है कि तालाब के पश्चिम दिशा में भेंट रोड के उत्तर भाग में सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा किए गए इस अतिक्रमण ने एक 'डोमिनो इफेक्ट' शुरू कर दिया है।
पहला असर: तालाब की मेड़ पर झोपड़ी बनने से उसका प्राकृतिक ढांचा कमजोर हुआ।
दूसरा असर: अतिक्रमण की इस शुरुआत को देखकर तालाब के आसपास के अन्य प्रभावशाली लोगों ने भी मौके का फायदा उठाया और तालाब के हिस्से को धीरे-धीरे 'खेत' में तब्दील करना शुरू कर दिया।
नतीजा: एक समय लबालब भरा रहने वाला तालाब, जो पशु-पक्षियों की प्यास बुझाता था और भूजल स्तर बनाए रखता था, आज अपना अस्तित्व खोने की कगार पर है।
बुजुर्गों की टीस: "जीवनरेखा" बन गई जमीन
गांव के बुजुर्गों की आंखों में आज भी उस तालाब की यादें ताजा हैं। वे कहते हैं कि यह तालाब कभी गांव की जीवनरेखा था। आज इसी तालाब की मेड़ पर हनुमान मंदिर के पास हुए अवैध कब्जे ने गांव के स्वरूप को बिगाड़ दिया है। ग्रामीणों का तीखा सवाल है— "जो व्यक्ति देश भर में घूमकर सामाजिक मुद्दों पर वीडियो बनाता है, वह खुद किस कानून के तहत सरकारी तालाब की मेड़ पर कब्जा जमाए बैठा है?"
प्रशासन की चुप्पी और बढ़ता सवाल
गांव में यह चर्चा आम है कि क्या आरटीआई कार्यकर्ता होने का मतलब कानून से ऊपर होना है? लोग अब रीवा कलेक्टर और राजस्व विभाग की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं। यदि एक सामाजिक कार्यकर्ता ही जल संरक्षण के नियमों की धज्जियां उड़ाएगा, तो समाज को क्या संदेश जाएगा? ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उनकी मांग है कि निष्पक्ष जांच हो और तालाब को अतिक्रमण मुक्त कराकर उसका प्राचीन स्वरूप लौटाया जाए। अब देखना यह है कि प्रशासन इस 'दीपक तले अंधेरे' को दूर करने के लिए कब और क्या कार्रवाई करता है।
