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| पत्रकारिता की आड़ में 'ब्लैकमेलिंग' का खेल?: सवालों में घिरे फर्जी पत्रकार का पर्दाफाश Aajtak24 News |
रीवा - रीवा जिला पुलिस अधीक्षक (एसपी) कार्यालय परिसर सोमवार को उस समय चर्चा का केंद्र बन गया, जब पत्रकारिता का चोला ओढ़े एक संदिग्ध व्यक्ति की पोल खुल गई। खुद को 'डिजिटल पत्रकार' बताने वाला एक यूट्यूबर, परिसर में मौजूद अन्य पत्रकारों की निजी बातचीत का चोरी-छिपे वीडियो रिकॉर्ड करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। जब उससे उसकी पहचान पूछी गई, तो वह घबराकर मौके से फरार हो गया।
घटनाक्रम: पेड़ की ओट और संदिग्ध इरादे
मिली जानकारी के अनुसार, सोमवार सुबह एसपी कार्यालय में हमेशा की तरह फरियादियों और पत्रकारों की चहल-पहल थी। इसी दौरान उक्त संदिग्ध व्यक्ति किसी फरियादी के माध्यम से एक सुनियोजित शिकायत दर्ज कराकर उसे 'सनसनीखेज खबर' का रूप देने की फिराक में था। इसी बीच, वह व्यक्ति कार्यालय परिसर के बाहर लगे एक पेड़ की ओट में छिप गया और वहां मौजूद कुछ पत्रकारों की सामान्य चर्चा का चोरी-छिपे वीडियो बनाने लगा। सूत्रों का दावा है कि उसका उद्देश्य इस वीडियो को तोड़-मरोड़कर सोशल मीडिया पर प्रसारित करना और पत्रकारों के बीच विवाद पैदा करना था।
सवालों की बौछार और घबराहट
पत्रकारों की पैनी नजर जैसे ही उस पर पड़ी, उन्होंने उसे घेर लिया। जब उससे वीडियो बनाने का कारण और उसके मीडिया संस्थान के बारे में पूछा गया, तो वह सकपका गया। वह न तो अपने संस्थान का नाम बता पाया और न ही कोई अधिकृत परिचय पत्र (ID Card) दिखा सका। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सवालों के जवाब देने के बजाय उसकी घबराहट बढ़ती गई और वह मौका पाकर वहां से चुपचाप खिसक गया।
विवादों से पुराना नाता
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि यह व्यक्ति पहले भी कई गंभीर विवादों में रहा है। पूर्व में भी इसके कुछ विवादित ऑडियो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं, जिनमें इसकी कार्यशैली और संदिग्ध संपर्कों को लेकर सवाल उठाए गए थे। आरोप लगाए जाते रहे हैं कि इसके संबंध कुछ अवैध कारोबारियों से हैं और यह कतिपय राजनीतिक संपर्कों के दम पर 'प्रायोजित' खबरें चलाने और लोगों को डराने-धमकाने का काम करता है। हालांकि, इन दावों की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
पत्रकारिता की गरिमा पर प्रहार
इस घटना ने रीवा के मीडिया जगत में आक्रोश पैदा कर दिया है। स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि यूट्यूब और सोशल मीडिया के दौर में कुछ लोग बिना किसी नैतिकता के खुद को पत्रकार बताकर इस जिम्मेदार पेशे को बदनाम कर रहे हैं। पत्रकारों ने जिला प्रशासन और पुलिस अधीक्षक से मांग की है कि:
एसपी कार्यालय परिसर के बाहर बैठने वाले संदिग्ध लोगों की पहचान सुनिश्चित की जाए।
पत्रकारिता के नाम पर ब्लैकमेलिंग करने वाले 'फर्जी' तत्वों पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो।
शासकीय कार्यालयों के आसपास सुरक्षा बढ़ाई जाए ताकि फरियादियों को गुमराह न किया जा सके।
प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल
यह घटना केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करती है। दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले गरीब फरियादी अपनी सुरक्षा की गुहार लेकर एसपी कार्यालय पहुंचते हैं। ऐसे में परिसर के ठीक बाहर 'बिचौलियों' और 'संदिग्ध पत्रकारों' का जमावड़ा कानून-व्यवस्था की छवि को धूमिल करता है।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता बनाए रखना केवल पत्रकारों की नहीं, बल्कि प्रशासन की भी जिम्मेदारी है। इस घटना के बाद यह आवश्यक हो गया है कि प्रशासन 'पीत पत्रकारिता' (Yellow Journalism) और फर्जी यूट्यूबरों के खिलाफ एक सख्त गाइडलाइन तैयार करे, ताकि सही पत्रकारों और जनता के बीच पारदर्शिता बनी रहे। फिलहाल, इस पूरी घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, जो चर्चा का विषय बना हुआ है।
