रीवा में शराब के लिए 'करोड़ों की जंग': घी-दूध से महंगा हुआ नशा, PTS समूह पर चंदेल ट्रेडर्स का 53 करोड़ का दांव Aajtak24 News

रीवा में शराब के लिए 'करोड़ों की जंग': घी-दूध से महंगा हुआ नशा, PTS समूह पर चंदेल ट्रेडर्स का 53 करोड़ का दांव Aajtak24 News

रीवा - नए वित्तीय वर्ष के आगमन से पहले रीवा जिले में शराब के ठेकों को लेकर सरगर्मी अपने चरम पर है। एक तरफ जहाँ आम आदमी दूध और घी जैसी बुनियादी चीजों की बढ़ती कीमतों से परेशान है, वहीं दूसरी तरफ शराब के ठेकों के लिए लगने वाली करोड़ों की बोलियों ने सबको हैरान कर दिया है। आबकारी विभाग द्वारा आयोजित ई-ऑक्शन में पीटीएस (PTS) चौराहा समूह सबसे बड़ा 'हॉटस्पॉट' बनकर उभरा, जिस पर चंदेल ट्रेडर्स ने अपना कब्जा जमा लिया है।

PTS समूह: उम्मीद से ज्यादा की लगी बोली

आबकारी विभाग ने शहर के प्रमुख पीटीएस समूह के लिए 51 करोड़ 75 लाख रुपये का आरक्षित मूल्य (Reserve Price) निर्धारित किया था। नीलामी की मेज पर जैसे ही यह समूह आया, चंदेल ट्रेडर्स ने आक्रामक रुख अपनाते हुए 53 करोड़ 58 लाख रुपये की उच्चतम बोली लगाई। हालांकि इस समूह के लिए एकल दावेदारी जैसी स्थिति थी, लेकिन विभागीय प्रक्रिया और शर्तों के बीच चंदेल ट्रेडर्स ने बाजी मार ली।

गढ़ समूह में दिखा कड़ा मुकाबला

नीलामी के दौरान सबसे रोचक मुकाबला गढ़ शराब दुकान समूह के लिए देखने को मिला। यहाँ एक नहीं, बल्कि तीन बड़े ठेकेदारों ने अपनी ताकत झोंकी। 22.49 करोड़ रुपये के आरक्षित मूल्य वाले इस समूह के लिए बोली का आंकड़ा तेजी से ऊपर गया। अंततः मांझी ग्रुप ने 24 करोड़ 55 लाख रुपये की बोली लगाकर अन्य प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ दिया और इस कीमती समूह को अपने नाम किया।

आधे से ज्यादा समूह रहे खाली: विभाग की बढ़ी टेंशन

रीवा जिले के लिए यह नीलामी पूरी तरह सफल नहीं रही। जिले के कुल 17 समूहों में से केवल 8 समूहों के लिए ही ठेकेदार मिले हैं। शेष 9 समूहों के लिए किसी भी फर्म या व्यक्तिगत ठेकेदार ने टेंडर नहीं डाला।

  • प्रमुख कारण: जानकारों का कहना है कि विभाग द्वारा तय किया गया 'आरक्षित मूल्य' बहुत अधिक है, जिससे छोटे और मंझोले ठेकेदार रेस से बाहर हो गए हैं।

  • अगला कदम: अब आबकारी विभाग के सामने इन खाली पड़े 9 समूहों को नीलाम करने की बड़ी चुनौती है। विभाग जल्द ही दोबारा नीलामी की तारीख घोषित कर सकता है, जिसमें आरक्षित मूल्य में रियायत या शर्तों में ढील दी जा सकती है।

समाज पर तीखा कटाक्ष: "घी-दूध पीछे, मदिरा आगे"

रीवा की सड़कों और गलियारों में इस नीलामी को लेकर एक तीखी चर्चा शुरू हो गई है। लोग कटाक्ष करते हुए कह रहे हैं कि समाज की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। जितने पैसे में पूरे जिले की दूध की आपूर्ति सुधारी जा सकती है, उससे कहीं ज्यादा का दांव केवल एक शराब की दुकान पर लग रहा है। यह स्थिति आर्थिक विषमता और नशे की बढ़ती प्रवृत्ति की ओर इशारा करती है।

Post a Comment

Previous Post Next Post