मनगवां में 'सिस्टम' पस्त, भू-माफिया मस्त: सरकारी जमीनों पर कब्जे के खेल में विधायक की भूमिका पर उठे सवाल Aajtak24 News

मनगवां में 'सिस्टम' पस्त, भू-माफिया मस्त: सरकारी जमीनों पर कब्जे के खेल में विधायक की भूमिका पर उठे सवाल Aajtak24 News

रीवा  - मध्य प्रदेश के रीवा जिले का मनगवां विधानसभा क्षेत्र इन दिनों विकास की सुर्खियों से दूर, बेशकीमती सरकारी जमीनों की 'लूट' को लेकर चर्चा के केंद्र में है। क्षेत्र में भू-माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे न तो प्रशासन से डर रहे हैं और न ही न्यायालय के आदेशों का सम्मान कर रहे हैं। इस पूरे खेल में सबसे चौंकाने वाली बात स्थानीय जनप्रतिनिधियों की संदिग्ध भूमिका और प्रशासनिक मशीनरी की 'रहस्यमयी' चुप्पी है, जिसने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और न्यायपालिका की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

न्यायालय के आदेशों की खुली अवहेलना

मनगवां, गढ़ और तिवनी क्षेत्रों से आ रही खबरें कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाली हैं। आरोप है कि राजस्व न्यायालयों द्वारा जिन जमीनों पर स्पष्ट रूप से 'स्थगन' (Stay Order) दिया गया है, वहाँ भी धड़ल्ले से अवैध निर्माण कार्य चल रहे हैं। स्थानीय सरपंचों और रसूखदारों ने राजस्व नियमों को ताक पर रख दिया है। जानकारों का कहना है कि स्थगन आदेश को अब केवल रद्दी का टुकड़ा समझा जा रहा है, क्योंकि जमीन पर कब्जा रोकने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नजर नहीं आता।

विधायक पर आरोपों की आंच

इस विवाद की आंच अब सीधे क्षेत्रीय विधायक इंजीनियर नरेंद्र प्रजापति तक पहुँच गई है। स्थानीय नागरिकों और प्रबुद्ध वर्ग का आरोप है कि विधायक के मौन समर्थन के कारण ही कब्जाधारियों के हौसले बढ़े हुए हैं। मार्च 2026 में विधायक के ग्राम 'माल' भ्रमण के दौरान के कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं, जिनमें कुछ दावों के आधार पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि सत्ता के रसूख का इस्तेमाल न्यायिक प्रक्रिया को दबाने के लिए किया जा रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सत्ता की हनक न्यायपालिका के आदेशों से ऊपर हो गई है?

प्रशासनिक चुप्पी: लाचारी या भ्रष्टाचार?

राजस्व विभाग और स्थानीय पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली इस वक्त सबसे बड़े कठघरे में है। दिन के उजाले में सरकारी जमीनों की घेराबंदी हो रही है, लेकिन पटवारी से लेकर तहसीलदार तक सब मौन हैं। इस चुप्पी को क्षेत्र के लोग 'मौन सहमति' मान रहे हैं। भ्रष्टाचार की इस गहरी जड़ ने सरकारी संपदा को असुरक्षित कर दिया है। जागरूक नागरिकों का कहना है कि यदि रक्षक ही भक्षक बन जाएंगे, तो भविष्य में यह स्थिति बड़े सामाजिक और हिंसक टकराव का रूप ले सकती है।

भविष्य पर मंडराता खतरा

अगर रीवा कलेक्टर और कमिश्नर ने इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप नहीं किया, तो मनगवां की वे जमीनें, जो भविष्य में स्कूल, अस्पताल या खेल मैदान के लिए इस्तेमाल हो सकती थीं, वे भू-माफियाओं के निजी तिजोरी का हिस्सा बन जाएंगी। सरकारी रिकॉर्ड में जो जमीनें 'सरकारी' दर्ज हैं, धरातल पर उन पर पक्के मकान और बाउंड्री वॉल खड़े हो चुके हैं।

मनगवां की यह स्थिति केवल एक विधानसभा की समस्या नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का संकेत है। यह न्याय प्रणाली से आम जनता के भरोसे को उठाने वाला कृत्य है। अब देखना यह है कि क्या शासन के उच्च अधिकारी इस 'राजनीतिक-प्रशासनिक-माफिया' गठजोड़ को तोड़ने का साहस दिखाते हैं या मनगवां की धरती इसी तरह रसूखदारों के आगे घुटने टेकती रहेगी।

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