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| विकास के नाम पर विनाश की खिंचती रेखाएं: रीवा-मऊगंज में योजनाओं पर सवाल, गरीबों के आवास कागजों में पूरे Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज की जिस परिकल्पना के साथ गांवों के विकास का सपना देखा था, उसका उद्देश्य था कि देश का सबसे अंतिम छोर तक हर व्यक्ति भी सम्मान और मूलभूत सुविधाओं के साथ जीवन जी सके। इसी सोच को साकार करने के लिए पंचायत व्यवस्था को मजबूत किया गया और ग्राम पंचायत से लेकर जनपद, जिला पंचायत, विधायक और सांसद निधि तक से विकास कार्यों के लिए भारी मात्रा में धनराशि उपलब्ध कराई गई। लेकिन मध्य प्रदेश के रीवा और मऊगंज जिलों में विकास के नाम पर कई स्थानों पर ऐसे आरोप सामने आ रहे हैं जो यह संकेत देते हैं कि योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्रों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है। स्थानीय समाजसेवियों और ग्रामीणों का आरोप है कि कई जनप्रतिनिधि और पंचायत स्तर के जिम्मेदार पदाधिकारी विकास कार्यों में पारदर्शिता के बजाय लापरवाही और अनियमितताओं को बढ़ावा दे रहे हैं। क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि कुछ जनप्रतिनिधियों के बीच यह धारणा तक बन गई है कि सीमित स्तर तक होने वाला भ्रष्टाचार “पंचायत का भ्रष्टाचार” नहीं माना जाता। हालांकि यह सोच ग्रामीण विकास की मूल भावना के विपरीत है, क्योंकि पंचायतों को गांव के विकास का सबसे मजबूत स्तंभ माना गया है।
सबसे अधिक सवाल प्रधानमंत्री आवास योजना और स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण को लेकर उठ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई ग्राम पंचायतों में रिकॉर्ड में तो आवास पूर्ण दिखाए गए हैं, लेकिन धरातल पर आज भी कई गरीब परिवार कच्चे मकानों या झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। आरोप है कि कहीं-कहीं राशि का आपसी बंटवारा कर लिया गया और वास्तविक निर्माण कार्य नहीं हुआ, जबकि दस्तावेजों में मकान पूर्ण दर्शा दिए गए। कुछ मामलों में यह भी कहा जा रहा है कि किसी दूसरे के बने हुए मकान की जियो टैग कर तस्वीरों को दस्तावेजों में जोड़कर योजनाओं को पूरा दिखा दिया गया।
रीवा जिले के गंगेव विकासखंड की कुछ ग्राम पंचायतें—जिनमें टिकुरी, गढ़ और गंगेव बाबूपुर रक्सा माजन जैसे नाम सामने आ रहे हैं—इन आरोपों के केंद्र में बताई जा रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि वर्ष 2004 से लेकर 2025 तक की पंचायत स्तर की आवास योजनाओं, जल योजना, तालाब सौंदारीकारन का रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति का मिलान कराया जाए, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि वर्तमान में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लगभग 1.20 लाख रुपये की सहायता दी जाती है, जिसमें लगभग 18 हजार रुपये मजदूरी के रूप में निर्धारित हैं, लेकिन कई स्थानों पर इस राशि का सही उपयोग नहीं हो रहा है। बताया जा रहा है कि जनपद पंचायत गंगेव के पूर्व जनपद उपाध्यक्ष संजय पांडे भी इन योजनाओं से संबंधित कई जानकारियां एकत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि अभी तक आधिकारिक रूप से कोई प्रमाणित रिपोर्ट सामने नहीं आई है, लेकिन क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है कि यदि निष्पक्ष जांच हो जाए तो योजनाओं के क्रियान्वयन की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
एक और गंभीर मुद्दा यह भी सामने आ रहा है कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी प्राप्त करना भी यहां आसान नहीं है। समाजसेवियों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि देश के कई राज्यों और जिलों में सूचना का अधिकार एक प्रभावी माध्यम है, जिससे योजनाओं की जानकारी आसानी से मिल जाती है। लेकिन रीवा और मऊगंज जिलों में कई बार विभागीय स्तर पर जानकारी प्राप्त करना कठिन हो जाता है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन का ध्यान उन समस्याओं की ओर आकर्षित करना है, जिनके कारण गरीब और जरूरतमंद लोग योजनाओं के वास्तविक लाभ से वंचित रह जाते हैं। उनका मानना है कि यदि पंचायत स्तर से लेकर जिला स्तर तक योजनाओं की पारदर्शी जांच और सामाजिक ऑडिट कराया जाए, तो न केवल अनियमितताओं पर रोक लगेगी बल्कि योजनाओं का लाभ सही पात्रों तक पहुंच सकेगा।
समाज के जागरूक लोगों ने राज्य सरकार, प्रशासनिक अधिकारियों, क्षेत्र के सांसदों और विधायकों से मांग की है कि प्रधानमंत्री आवास और शौचालय जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि कहीं भी अनियमितताएं पाई जाती हैं तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, ताकि विकास की योजनाएं वास्तव में गरीबों के जीवन में परिवर्तन ला सकें और गांधीजी के ग्राम स्वराज का सपना साकार हो सके।
