पर्यावरण की अंधी दौड़ में विलुप्त होते वृक्ष: रीवा–मऊगंज में 20 लाख से अधिक पेड़ों के खत्म होने की आशंका Aajtak24 News

पर्यावरण की अंधी दौड़ में विलुप्त होते वृक्ष: रीवा–मऊगंज में 20 लाख से अधिक पेड़ों के खत्म होने की आशंका Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - विज्ञान और विकास की तेज रफ्तार ने जहां मानव जीवन को आधुनिक सुविधाएं दी हैं, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण और पृथ्वी की प्राकृतिक संपदा गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। विकास की इस चक्रवाती गति में प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है। मध्य प्रदेश के रीवा और मऊगंज जिलों में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक दिखाई दे रही है, जहां पिछले दो दशकों में लाखों की संख्या में वृक्ष विलुप्त हो चुके हैं। अनुमान है कि इन दोनों जिलों में लगभग 20 लाख से अधिक पुराने वृक्ष, जिनमें पीपल, बरगद, आम, नीम और जामुन जैसे पारंपरिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्ष शामिल थे, अब समाप्त हो चुके हैं। भारतीय वैदिक परंपरा में वृक्षों को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि पूजनीय और जीवनदायी तत्व माना गया है। पीपल, बरगद, नीम, मौहा और आम जैसे वृक्षों को धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व प्राप्त रहा है। पीपल और बरगद को दीर्घायु, शुद्ध वायु और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक माना गया है, वहीं नीम को औषधीय गुणों के कारण स्वास्थ्य का संरक्षक कहा गया है। ये वृक्ष न केवल सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व रखते थे, बल्कि भूजल स्तर बनाए रखने, तापमान नियंत्रित करने और वातावरण को शुद्ध रखने में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार एक विकसित वृक्ष लगभग 100 गैलन यानी लगभग 400 लीटर तक पानी को अवशोषित कर भूमि में जल संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है। साथ ही यह वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाता है और प्रदूषण को नियंत्रित करता है। लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और सड़कों के विस्तार के कारण बड़ी संख्या में वृक्षों की कटाई हुई है। विशेष रूप से 2004 के बाद राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण और अन्य विकास कार्यों के चलते सड़क किनारे लगी वृक्षों की लंबी श्रृंखलाएं लगभग समाप्त हो गई हैं।

इसके अलावा, जिन क्षेत्रों में कभी घने जंगल हुआ करते थे, वहां अब फैक्ट्रियां, कॉलोनियां और बड़े-बड़े आवासीय परिसर बन गए हैं। वाहनों की संख्या में हजारों प्रतिशत वृद्धि हो चुकी है, जिससे प्रदूषण और तापमान दोनों में बढ़ोतरी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अब शहरों की तर्ज पर निर्माण कार्य तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे प्राकृतिक हरियाली लगातार कम होती जा रही है। परिणामस्वरूप हर वर्ष गर्मी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है और जल संकट की स्थिति भी गंभीर होती जा रही है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में समय-समय पर वृक्षारोपण अभियान चलाए गए हैं। सरकारी और सामाजिक स्तर पर लाखों पौधे लगाने के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में इन योजनाओं का बड़ा हिस्सा केवल फाइलों, अभिलेखों और रजिस्टरों तक ही सीमित रह जाता है। लगाए गए पौधों की निगरानी और संरक्षण का अभाव होने के कारण अधिकांश पौधे कुछ ही समय में सूख जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं।पर्यावरण संरक्षण के लिए यह आवश्यक है कि सरकार इस विषय को गंभीरता से ले और रीवा–मऊगंज जिले में वृक्षों की वास्तविक स्थिति का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए। यदि प्रशासन चाहे तो ग्राम पंचायत स्तर पर सचिव, रोजगार सहायक और पटवारी के माध्यम से मात्र 24 घंटे में प्राथमिक सर्वेक्षण कराया जा सकता है। आज जब भूमि अभिलेख और खसरे कंप्यूटरीकृत हो चुके हैं, तब वास्तविक आंकड़े जुटाना कठिन नहीं है।

साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रतिवर्ष कितने वृक्ष प्राकृतिक रूप से सूखते हैं और कितने विकास कार्यों के नाम पर काटे जा रहे हैं। इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच किसी स्वतंत्र या केंद्रीय जांच एजेंसी से कराने की मांग भी उठ रही है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और भविष्य की पर्यावरणीय नीतियां सही दिशा में बनाई जा सकें। यह मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल या सरकार का नहीं बल्कि पूरे समाज और मानवता के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। सत्ता और विपक्ष दोनों को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। पर्यावरण संरक्षण केवल दिखावटी योजनाओं और औपचारिक वृक्षारोपण कार्यक्रमों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए दीर्घकालिक नीति, सख्त निगरानी और जनभागीदारी की आवश्यकता है। यदि समय रहते प्रकृति के इस संकट को नहीं समझा गया, तो आने वाली पीढ़ियों को हरियाली के स्थान पर केवल कंक्रीट के जंगल और बढ़ता तापमान ही विरासत में मिलेगा। इसलिए आवश्यक है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि पृथ्वी की यह प्राकृतिक धरोहर सुरक्षित रह सके।

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