तालाबों पर बढ़ते अतिक्रमण और संसाधनों के दोहन पर सवाल, जनजागरण की आवश्यकता - समाजसेवियों ने उठाई आवाज Aajtak24 News

तालाबों पर बढ़ते अतिक्रमण और संसाधनों के दोहन पर सवाल, जनजागरण की आवश्यकता - समाजसेवियों ने उठाई आवाज Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - स्वतंत्र भारत के इतिहास में प्राकृतिक जल स्रोतों के निरंतर दोहन और अतिक्रमण को लेकर समाज के जागरूक वर्ग में चिंता गहराती जा रही है। सार्वजनिक, निजी तथा शासकीय तालाबों और जलस्रोतों का अस्तित्व तेजी से समाप्त होता जा रहा है। कई समाजसेवियों और पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय तक उदासीनता बनी रही, जिसके कारण जलस्रोतों पर अवैध कब्जे होते चले गए और अंततः न्याय की मांग को लेकर लोगों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। समाजसेवियों का कहना है कि न्यायालय की कड़ी टिप्पणियों के बाद प्रशासन सक्रिय अवश्य हुआ, किंतु अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई अभी भी चयनात्मक रूप से की जा रही है। उनका आरोप है कि प्रभावशाली लोगों के इशारे पर ही कार्रवाई होती है, जबकि अतिक्रमण के मूल कारणों और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं की जाती।

जागरूक नागरिकों ने सवाल उठाया है कि जब शासकीय तालाब, सड़क या अन्य सार्वजनिक भूमि पर अवैध निर्माण कर दुकानें और मकान बनाए जाते हैं, तो उस समय संबंधित पटवारी, पंचायत प्रतिनिधि या स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही क्यों तय नहीं की जाती। इसी प्रकार अतिक्रमित बस्तियों में सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं किन नियमों के तहत उपलब्ध कराई जाती हैं, यह भी जांच का विषय है। उनका मानना है कि यदि प्रारंभिक स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए तो भविष्य में अधिकांश अतिक्रमण स्वतः रुक सकते हैं। दूसरी ओर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि कई स्थानों पर निजी तालाबों को पाटकर खेती या आवासीय प्लॉट में बदलकर बेचा जा रहा है, जिससे जल संरक्षण की परंपरा समाप्त होती जा रही है। पर्यावरणविदों का कहना है कि जलस्रोतों का संरक्षण न होने से भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और आने वाले समय में जल संकट और गंभीर हो सकता है।

कुछ विधि विशेषज्ञों और समाजसेवियों का मत है कि यदि जनहित याचिकाओं के माध्यम से इस विषय को व्यापक रूप से न्यायालय के समक्ष रखा जाए, तो शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन, अवैध बस्तियों पर हुए खर्च और भूमि उपयोग की वास्तविक स्थिति की निष्पक्ष जांच संभव हो सकेगी। उनका कहना है कि सरकारी अभिलेखों और जमीनी हकीकत में अक्सर बड़ा अंतर देखने को मिलता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि संकट को भी इस समस्या से जोड़कर देखा जा रहा है। किसानों का कहना है कि जलस्रोतों के समाप्त होने और सिंचाई सुविधाओं के अभाव में खेती कठिन होती जा रही है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ रही है। एक समय था जब गांवों में तालाब, कुएं, बगीचे और परंपरागत जल प्रबंधन प्रणाली ग्रामीण जीवन का आधार थे, लेकिन अब ये तेजी से विलुप्त हो रहे हैं।

वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि पहले गांवों में आम, महुआ, जामुन, पीपल, बरगद और नीम जैसे वृक्षों से हरियाली बनी रहती थी तथा जलवायु संतुलित रहती थी। लोग बगीचे लगाते थे और पेड़ों को परिवार के सदस्य की तरह संजोते थे, लेकिन अब कृषि और वृक्षारोपण की जगह रोजगार के अन्य साधनों को प्राथमिकता मिलने लगी है। समाज के जागरूक लोगों ने मांग की है कि जलस्रोतों के संरक्षण, अतिक्रमण पर स्थायी रोक, वृक्षारोपण को बढ़ावा और किसानों को पर्याप्त सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए दीर्घकालिक नीति बनाई जाए। उनका कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में जल, पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चुनौतियां सामने आ सकती हैं। समाचार पत्र के माध्यम से सामाजिक संगठनों ने आम जनता से भी अपील की है कि वे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में सहयोग करें, अवैध अतिक्रमण का विरोध करें तथा जल और पर्यावरण बचाने के लिए सामूहिक प्रयास करें, क्योंकि यही आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की आधारशिला है।



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