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| रीवा–मऊगंज में गहराता जल संकट: नदियां सूखी, तालाब खत्म, जल जीवन मिशन की योजनाएं भी अधूरी Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - मार्च माह की शुरुआत के साथ ही रीवा और मऊगंज जिलों में पानी का भयावह संकट दिखाई देने लगा है। जिले के अधिकांश क्षेत्रों में हर वर्ष गर्मी के मौसम में जल संकट गंभीर रूप ले लेता है। अनुमानित रूप से करीब 80 प्रतिशत स्थानों पर पेयजल की समस्या उत्पन्न हो जाती है। इसके पीछे नदियों, तालाबों और प्राकृतिक जल स्रोतों का लगातार नष्ट होना प्रमुख कारण माना जा रहा है। प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है, जिससे आने वाले समय में हालात और भी चिंताजनक होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। जानकारों के अनुसार जिले की नदियों से प्राकृतिक ढंग से बनने वाले बालू और पत्थरों का बड़े पैमाने पर खनन किया जा रहा है। इससे नदियों की जलधारण क्षमता प्रभावित हो रही है और कई स्थानों पर नदियां व छोटे जलस्रोत सूखने की स्थिति में पहुंच गए हैं। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में पुराने तालाबों को समतल कर खेत, भवन और प्लांट निर्माण किए जा रहे हैं। परिणामस्वरूप जल संचयन के पारंपरिक स्रोत धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं।
इसी के साथ बोरवेल और हैंडपंपों की संख्या में लगातार वृद्धि भी जल संकट का एक बड़ा कारण बन रही है। भूजल का अत्यधिक दोहन होने से जल स्तर काफी नीचे चला गया है। वर्तमान स्थिति यह है कि कई हैंडपंपों से पानी की जगह हवा निकलने लगी है, जबकि कई बोरवेल पूरी तरह सूख चुके हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की छोटी-छोटी नदियां भी अब लगभग समाप्त होने की कगार पर हैं। हाल के वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा जल जीवन मिशन के तहत रीवा और मऊगंज जिलों में लगभग 20 हजार करोड़ रुपये की लागत से घर-घर शुद्ध पेयजल पहुंचाने की योजना चलाई गई। इसके तहत कई गांवों में पाइपलाइन बिछाई गई और पानी की टंकियां भी बनाई गईं, लेकिन पर्याप्त जलस्तर नहीं होने के कारण अधिकांश स्थानों पर पानी की नियमित सप्लाई शुरू नहीं हो पाई है। ग्रामीणों का कहना है कि योजनाएं कागजों में तो पूरी दिख रही हैं, लेकिन धरातल पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं।
स्वतंत्रता के बाद से सरकारों द्वारा समय-समय पर जल संरक्षण के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई गईं, जिनमें तालाबों का निर्माण और हैंडपंपों की स्थापना प्रमुख रही है। हालांकि आज स्थिति यह है कि इन योजनाओं के तहत बने कई तालाब या तो विलुप्त हो चुके हैं या अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं। परिणामस्वरूप जल संकट दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है। रीवा जिले में विशेष रूप से त्योंथर, सिरमौर, जवा, गंगेव, मनगवा और पहाड़ी क्षेत्रों में पानी की समस्या अधिक देखी जा रही है। वहीं मऊगंज जिले के हनुमना, मऊगंज और नईगढ़ी क्षेत्रों में भी जल संकट गंभीर रूप ले रहा है। ग्रामीण इलाकों में जल स्रोतों के सूखने से लोगों को दूर-दूर तक पानी के लिए भटकना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पशु-पक्षियों और पर्यावरण पर भी पड़ रहा है। पानी की कमी के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में पेड़-पौधे सूख रहे हैं, जिससे पर्यावरण संतुलन भी बिगड़ रहा है। यदि समय रहते जल संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में गर्मी के मौसम में हालात और भी गंभीर हो सकते हैं। समाजसेवियों, भूगर्भ वैज्ञानिकों और जनप्रतिनिधियों का मानना है कि जल संकट से निपटने के लिए व्यापक स्तर पर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। पुराने तालाबों का संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नदियों में अवैध खनन पर रोक और वृक्षारोपण जैसे उपायों को प्राथमिकता देनी होगी। अन्यथा आने वाले समय में पानी की स्थिति इतनी गंभीर हो सकती है कि गर्मी के मौसम में जीवन यापन करना ही कठिन हो जाएगा।
