राजस्व न्यायालय के 'स्थगन आदेश' का उड़ रहा मजाक, गढ़ में स्कूल की जमीन पर सरपंच का अवैध कब्जा! Aajtak24 News

राजस्व न्यायालय के 'स्थगन आदेश' का उड़ रहा मजाक, गढ़ में स्कूल की जमीन पर सरपंच का अवैध कब्जा! Aajtak24 News

रीवा/मनगवां - रीवा जिले के मनगवां तहसील अंतर्गत राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली और पुलिस की उदासीनता ने न्याय व्यवस्था पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। ताजा मामला नायब तहसीलदार वृत्त गढ़ का है, जहाँ शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय 'माल' के प्रांगण में सरपंच द्वारा नियमों को ताक पर रखकर पंचायत भवन का निर्माण कराया जा रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश (Stay Order) जारी होने के बावजूद निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर जारी है।

मजाक बनकर रह गए न्यायालयीन आदेश राजस्व न्यायालय के हर आदेश में पुलिस, राजस्व विभाग और संबंधित पक्षों को प्रतिलिपि भेजी जाती है, ताकि आदेश का पालन सुनिश्चित हो सके। लेकिन धरातल पर स्थिति इसके उलट है। चर्चा है कि तहसील स्तर पर स्थगन आदेश प्राप्त करने के लिए 'सेवा शुल्क' (रिश्वत) की एक अघोषित व्यवस्था चल रही है। पटवारी प्रतिवेदन से लेकर कार्य रुकवाने तक, हर कदम पर आम आदमी को आर्थिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है।

पुलिस और राजस्व विभाग की 'लाचार' दलीलें गढ़ थाने के माल बीट प्रभारी का तर्क हैरान करने वाला है। उनका कहना है कि उन्होंने "सूचना दे दी है और तामीली करा दी है, कार्य रोकना उनका काम नहीं है।" सवाल यह उठता है कि यदि पुलिस और राजस्व अमला (पटवारी, चौकीदार) न्यायालय के आदेश का पालन सुनिश्चित नहीं करा सकते, तो फिर उन्हें आदेश की प्रतिलिपि ही क्यों भेजी जाती है? क्या शासकीय संपत्ति की रक्षा करना केवल जनता की जिम्मेदारी है?

कुंभकर्णी निद्रा में शिक्षा विभाग इस पूरे मामले में शिक्षा विभाग का रवैया भी अत्यंत गैर-जिम्मेदाराना है। अपनी ही संस्था (स्कूल) की जमीन पर अवैध निर्माण होने के बावजूद विभाग के अधिकारी चैन की नींद सो रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें वेतन और कागजी खानापूर्ति के अलावा स्कूल के अस्तित्व से कोई सरोकार नहीं है।

जनक्रांति की चेतावनी मनगवां और गढ़ क्षेत्र में जिस तरह से कानून का मजाक बनाया जा रहा है, वह किसी बड़ी जनक्रांति का संकेत दे रहा है। मऊगंज में हाल ही में निर्मित हुई स्थितियां इस बात का प्रमाण हैं कि जब प्रशासनिक और न्यायिक जिम्मेदारियां दम तोड़ देती हैं, तो जनता सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाती है।

संभागीय आयुक्त और जिला कलेक्टर को इस मामले पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। क्या कानून केवल गरीबों और मध्यम वर्ग के लिए है? यदि शासकीय संपत्ति पर भी न्यायालय के आदेश प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं, तो आम जनता का न्याय प्रणाली से विश्वास उठना निश्चित है। ग्रामीणों ने मांग की है कि तहसीलदार तत्काल घटनास्थल का निरीक्षण कर 'न्यायालयीन आदेश की अवहेलना' का प्रकरण दर्ज करें और दोषियों को दंडित करें।



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