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| रीवा-मऊगंज में कागजों से गायब हैं हजारों करोड़ की खदानें, पाताल तक छलनी हुआ धरती का सीना Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - विंध्य क्षेत्र में कानून की धज्जियां उड़ाते हुए अवैध उत्खनन का एक ऐसा 'खूनी खेल' चल रहा है, जिसने न केवल सरकार के खजाने को हजारों करोड़ का चूना लगाया है, बल्कि पर्यावरण का भी गला घोंट दिया है। रीवा और नवगठित जिला मऊगंज में रसूखदारों के इशारे पर पहाड़ियों और नदियों का अस्तित्व मिटाया जा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिन खदानों से दिन-रात मोरम और मिट्टी की निकासी हो रही है, सरकारी रिकॉर्ड में उनका कोई वजूद ही नहीं है।
हर्रहा में 'पाताल' तक खुदाई: 50 फीट गहरे मौत के कुएं
अवैध उत्खनन की भयावहता देखनी हो तो मऊगंज के हर्रहा जैसे गांवों का रुख करें। यहाँ मोरम (हार्ड मिट्टी) निकालने के चक्कर में ठेकेदारों ने जमीन को 50 फीट से ज्यादा गहरा खोद डाला है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह खुदाई किसी वैध लीज के तहत नहीं, बल्कि 'माफिया राज' के तहत हो रही है। बिना किसी रॉयल्टी और सुरक्षा मानकों के, हजारों ट्रक मोरम और मिट्टी सड़क निर्माण और बड़ी बिल्डिंगों में खपा दी गई है।
रसूखदारों का 'अभयदान': प्रशासन बना मूकदर्शक
इस पूरे काले कारोबार के पीछे सत्ता और विपक्ष के रसूखदार ठेकेदारों का 'कवच' काम कर रहा है। भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि पटवारी से लेकर तहसील कार्यालय तक के अधिकारी मौन साधे हुए हैं। हाल ही में जब हर्रहा में जांच की औपचारिकता पूरी करने कुछ अधिकारी पहुंचे, तो उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि "हमें पता ही नहीं कि जमीन किसकी है।" यह बयान प्रशासनिक तंत्र की लाचारी या मिलीभगत की ओर साफ इशारा करता है।
"जब खदान का रिकॉर्ड ही नहीं है, तो रॉयल्टी कैसी? यह सीधे तौर पर सरकारी राजस्व की डकैती है।" — आक्रोशित ग्रामीण
आदिवासी बस्तियों और स्कूलों पर संकट
अवैध उत्खनन का असर अब इंसानी बस्तियों पर दिखने लगा है। भारी विस्फोटों और अंधाधुंध खुदाई के कारण आदिवासी बस्तियों के घरों और सरकारी स्कूलों की दीवारों में दरारें आ गई हैं। ग्रामीण भय के साये में जीने को मजबूर हैं और कई लोग पलायन की तैयारी कर रहे हैं। नदियों का जलस्तर गिर रहा है और पहाड़ियां मैदान में तब्दील हो रही हैं।
प्रशासन से जनता के तीखे सवाल:
जनता अब न्यायालय और उच्च अधिकारियों से इन सवालों का जवाब चाहती है:
दोषियों पर 10 गुना जुर्माना कब? क्या सरकार खनिज नियमों के तहत रसूखदारों से 10 गुना पेनल्टी और टैक्स वसूलने का साहस दिखाएगी?
अधिकारियों पर गाज कब गिरेगी? जिन अधिकारियों की नाक के नीचे यह अवैध कारोबार फल-फूल रहा है, उन पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
संयुक्त जांच क्यों नहीं? क्या संभागीय आयुक्त और कलेक्टर खनिज एवं राजस्व विभाग की संयुक्त टीम बनाकर हर पटवारी हल्का की जमीनी हकीकत खंगालेंगे?
राजस्व की 'महाचोरी'
मध्य प्रदेश खनिज नियमों के अनुसार अवैध उत्खनन पर सख्त सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन रीवा-मऊगंज में नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। हजारों करोड़ रुपये की मोरम-मिट्टी और बालू का परिवहन खुलेआम हो रहा है, लेकिन खनिज विभाग का अमला 'कुंभकर्णी नींद' में सोया है। यह केवल मिट्टी और पत्थर की चोरी नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के संसाधनों की लूट है। यदि समय रहते इन 'सफेदपोश माफियाओं' पर लगाम नहीं कसी गई, तो विंध्य का भूगोल और पर्यावरण हमेशा के लिए बदल जाएगा। अब देखना यह है कि प्रशासन इस 'महाचोरी' पर लगाम लगाता है या भ्रष्टाचार का यह खेल बदस्तूर जारी रहता है।
